मेरा शहर
क्या तारीफ करूँ मैं अपने शहर कीमेरे शहर का है अद्बुत नज़ारापहाड़ों के बीच बसा शहर घुमारवींसीर गंगा का है
Read Moreअपने गांव की माटी से जो जुड़ा है रहतादिल में उसके प्यार का दरिया है बहतादूर रह कर भी आती
Read Moreसमय का चक्र चला यह कैसाहर तरफ फैला है उसका जालमोबाइल हो गया बहुत स्मार्टऔर आदमी का दिमाग कंगाल समय
Read Moreइंसान ने जब से तरक्की की राह है पकड़ीनाले तो दूर की बात नदी की राह भी जकड़ीअपने जाल में
Read Moreउम्र के उस पड़ाव पर छूट गया अपनों का साथजब जरूरत थी बढ़ापे में दोगे सहारा थाम लोगे हाथक्या कसूर
Read Moreकितना रोये होंगे वह सेव से लदे पेड़जब चली होगी विभाग की उनपर कुल्हाड़ीक्या कसूर था उनका यदि सरकारी जमीन
Read Moreनज़र नज़र में होता है फ़र्क बहुतकोई नज़रें होकर भी है अंधादेखकर भी कर देता है कोई अनदेखादुनियां में सब
Read Moreक्यों हो रहा विनाश हर जगहसब जानते हैं पर हैं खामोशनियमों को रखते हैं ताक परसत्ता के नशे में होकर
Read Moreकभी सकूं से बैठ कर मिटा लीजियेअपने जीवन भर की थकानन जाने कब आ जाये मालिक का बुलावाखाली करवा ले
Read Moreमत किसी के दिल को यूं ही दुखानाहमेशा मीठा बोलना औरों के काम आनाअमीरों को देख कर रुख बदल लेते
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