सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक
मन को हरते है सदा, मीठे मीठे बोल। बोल अनोखी चाशनी, रिश्तों में दे घोल ।। घोल प्रेम संसार में
Read Moreमन को हरते है सदा, मीठे मीठे बोल। बोल अनोखी चाशनी, रिश्तों में दे घोल ।। घोल प्रेम संसार में
Read Moreहोते है बस नाम के, रह जाते बेनाम । रिश्ते इंटरनेट के , आते कब हैं काम ।। जबरन पकडे
Read Moreवह दौर जहाँ खतो से खैरियत पुछी जाती थी , खुशखबरी ली जाती थी । मजमून देख सब दिलों के
Read Moreजीवन का रंगरास तुम्हीं से , तुम पर तन मन हारा है । सरल, सजल हृदय पर तेरे न्यौछावर जग
Read More1- तोड़ नेह के बाँध तुम, चले गये चितचोर । धधक रही अति वेदना,मचा हृदय में शोर ।। दावे सारे
Read Moreमैं धरा अधीर हूँ पीड़ित मन की पीर हूँ। सोखती हूँ हर व्यथा और जमा गई जो नीर हूँ ।
Read Moreज़िन्दगी गुजर ही जाती है पर अभी रश्मि को समझ नहीं आ रहा था कि जीवन का ये अंधेरा कैसे
Read Moreवो लेखिका नहीं थी… वो कवियत्री भी नहीं थी न जाने कब अपने भावो को सरल सहज आकार देने लगी
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