स्मृति के पंख – 15
गढ़ीकपूरा में एक संत रहा करते थे। उनकी रिहायश ऊपर छत पर कमरा में थी। नीचे सेवादार मौजूद रहता था।
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Read More1993 का वर्ष हमारे लिए लगभग सामान्य रहा। मैं आर्थिक चिन्ताओं से मुक्त था और अपनी पत्नी तथा 2-3 साल
Read Moreअब दुकान की हालत फिर से ठीक होने लगी। कुछ दिन बाद एक रात को बरकत (यह सकीना की बड़ी
Read Moreवाराणसी में मेरा संघ से सम्पर्क प्रारम्भ में ही हो गया था। वास्तव में मैं सबसे पहले गोदौलिया के संघ
Read Moreउन सब लड़कों के अक्सर बाहर से मुलाकाती भी आते रहते और घर से पार्सल भी आते रहते। लेकिन इतने
Read Moreरातभर आनन्द से सोने के बाद हम सुबह जल्दी उठकर गाड़ी पकड़ने भागे। ठीक समय पर गाड़ी आ गयी और
Read Moreरात को मुझे बुखार हो गया। मैंने वार्डन को बुलाकर कहा, लेकिन उसने कोई परवाह नहीं की। सुबह मैंने सुखनजी
Read Moreउसी वर्ष अर्थात् सन् 1992 की गर्मियों में नदेसर (वाराणसी) में हमारी कालोनी से सटी हुई राजा नदेसर की कोठी
Read Moreमुझे तो कोई तकलीफ न थी, लेकिन शाम को जब भ्राताजी को आते देखता सर पर आटा उठाये, तो बड़ी
Read Moreसन् 1992 के अप्रैल माह में श्रीमतीजी की मम्मीजी ने अपनी सभी बेटियों और दामादों के साथ वैष्णो देवी की
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