दोहा छंद
दूर्वा श्री गणेश को, माँ दुर्गा श्रृंगार। भोग लगाओ प्रेम, होगा जन उद्धार।। सभी निभाते भूमिका, जैसा बुद्धि विवेक। सबके अपने रंग
Read Moreब्रांडों की इस दौड़ में, बिकता मन का चैन।तन पर लाखों खर्च हैं, भीतर खाली नैन।। किस्तों में जीवन कटा,
Read Moreदेशभक्ति जब सो गई, बढ़ने लगे विकार।जागो भारतवासियो, फिर जागें संस्कार।। जो भारत के शत्रु हैं, उनसे कैसा प्यार।देशप्रेम की
Read Moreब्रांडों की इस दौड़ में, बिकता मन का चैन।तन पर लाखों खर्च हैं, भीतर खाली नैन।। किस्तों में जीवन कटा,
Read Moreबाजों से वह क्यों डरे, चिड़िया रखती पंख।हिम्मत जिसके खून में, टूटे हर इक दंभ।। गिरने का डर छोड़ दे,
Read Moreकाँटे जितने बढ़ गए, उतना बढ़ा जुनून।मंजिल चाहे दूर थी, मन में रहा सुकून।। ठोकर देकर सोचते, अब टूटेगा आज।गिरकर
Read Moreफिर से उठने लग गए, बाबर वाले पाँव।औरँगजेबी सोच से, सहमा सारा गाँव॥ नफरत लेकर घूमते, चेहरे बने महान।प्रेम-सद्भाव भूलकर,
Read Moreगलती अपनी मानना, लगता भारी पाप।शनि-मंगल पर डालकर, धोते अपने पाप।। कर्मों में जब छेद हों, ग्रह बन जाएँ ढाल।कुँडली
Read Moreनन्हे हाथों में छुपा, सपनों का संसार।मेहनत से ही खिल उठे, जीवन का हर द्वार।। सूरज रोज़ सिखा रहा, उठकर
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