कोशिश कर हर बार
धरती माता सह रही, मानव अत्याचार।पेड़ कटे तो घट रहा, जीवन का आधार।। बादल गरजे दूर से, बरसे मीठी धार।सूखी
Read Moreधरती माता सह रही, मानव अत्याचार।पेड़ कटे तो घट रहा, जीवन का आधार।। बादल गरजे दूर से, बरसे मीठी धार।सूखी
Read Moreतप्त धूप अब कह रही, सुनो धरा की पीर।सूखे वन-उपवन हुए, रोए झरने-नीर।। सूरज अग्नि उगल रहा, झुलसे सब इंसान।छाँव
Read Moreजेठ दुपहरी आग सी, झुलसे खेत-खलिहान।पारा चढ़कर बोलता, व्याकुल हुआ जहान॥ सूरज बरसे आग जब, तपे धरा आकाश।पारा हुआ पचास
Read Moreबूँद-बूँद से सिंधु है, बूँदों से संसार।जल बिन सूना ये जगत, जल से ही उद्धार॥ सूखे नद-नाले सभी, प्यासा हुआ
Read Moreकुर्सी से सदैव करें, जो भी प्यार दुलारवही नेता स्वयं का, रमेश करें उद्धार कुर्सी छिनने वास्ते, रहता है तैयारहरदम
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