हाइकु/सेदोका

हाइकु/सेदोका

हसरतों से गुजारिश है कि कहीं और जा बसें

थकी सी राहें,सपनों की धूल उड़े,मन खो जाए। चाँदनी फीकी,रात कुछ कहती है,ख़ामोशियाँ भी। मंज़िल न पूछो,कदम थम जाएँ जब,हवा

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हाइकु/सेदोका

कोंपलें खिलें यही ज़िंदगी है

धीरे से बोली,सुबह की पहली किरण —“उठो, मुस्कुराओ।” ओस की बूँदें,फूलों से बातें करतीं,सपनों की भाषा। मिट्टी की गोद में,एक

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हाइकु/सेदोका

मृत्यु के पीछे छिपे हुए स्वार्थ

मौन सिसकियाँ हैं,धुएँ में गुम आहटें,कौन सुनता है। अंतिम साँसों में,स्वार्थ का जाल गहरा,मनुष्य अंधा। श्रद्धा के नीचे,लालच की परछाईं,छिपी

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