कविता

एक झीना सा आवरण

  बिना किये तुम्हारा  दर्शन सूनी लगती हैं धरती सूना लगता हैं अंबर माना की तुम मेरे लिये सिर्फ एक ख्याल हो वैसे भी जीवन भी तो हैं एक सपन कितना भी चाहों दूरी बनी ही रहती हैं इस जग में नहीं हो पाता हैं अदृश्य से साकार मिलन बीच में रहता ही हैं एक झीना सा […]

उपन्यास अंश

यशोदानंदन-११

कंस तो कंस था। वह पाषाण की तरह देवी देवकी की याचना सुनता रहा, पर तनिक भी प्रभावित नहीं हुआ। देवी देवकी ने कन्या को अपनी गोद में छिपाकर आंचल से ढंक दिया था, परन्तु कंस ने आगे बढ़कर गोद से कन्या छीन ली। स्वार्थ और भय ने उसके हृदय से स्नेह और सौहार्द्र को […]

इतिहास

महापुरूषों के प्रेरक एवं श्रद्धास्पद महर्षि दयानन्द

महर्षि दयानन्द महाभारत काल के बाद विगत पांच हजार वर्षों में वेदों के पहले ऋषि हुए हैं। उन्होंने वेदों का संस्कृत और हिन्दी में सत्य वेदार्थ वा भाष्य करके मानवता का जो उपकार किया है उसके लिए संसार उनका सदा सर्वदा ऋणी रहेगा। महर्षि दयानन्द को ही इस बात का श्रेय प्राप्त है कि उन्होंने […]

अन्य

एक बिटिया का एक स्वर्गीय पिता को पत्र

(एक लड़की जिसने बस कुछ दिनों पहले अपने पिता को खोया उसकी क्या दशा होगी , और जब वो अपने पिताजी को पत्र लिखेगी तो क्या लिखेगी बस इसकी एक कल्पना की थी मैंने … वही लिख रहा हूँ… चूंकि पत्र पिता को लिखा जा रहा है इसलिए पारिवारिक बातों को नही लिया गया है […]

कविता

“दिखाई दिया करती थी ••••”

दिवस के अवसान में हमेशा, दृश्यमान हुआ करती थी। कोमलता की भाव लिये , दिखाई दिया करती थी। आँखों के साँचों में आकर, रमणीय रूप बन जाती थी। तन-मन सारा प्लवित करकें, फिर बिलुप्त हो जाती थी। —–रमेश कुमार सिंह ♌

कविता

कविता

चार छंदों में विचार कविता नए युग का नवद्वार कविता प्राण प्राण बहती है हर मन ये कहती है शब्द स्वर तो शब्दों की झंकार कविता प्रियतम की बात हो या विरह भरी रात हो भूखी आँतों की आवाज रोते हृदयों का साज किसी पंछी की चहक कभी बागों की महक कभी सागर की लहर […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – चैनलों की शाख पर…

चैनलों की शाख पर अब झूठ का अम्बार है । सिर्फ तारीफों की चर्चा में बिका अखबार है ।। रोज कलमें हो रहीं गिरवीं इसी दरबार में । फिर कसीदों से कलम का हो रहा व्यापार है।। कब्र से बोली ग़ज़ल मेरा तसव्वर खो गया । अब खुशामद के लिए बिकने लगा फनकार है ।। […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : होली आई है

उड़े अबीर-गुलाल कि होली आई है. करते रंग कमाल कि होली आई है. भाँग छानकर हुए रवाना झाँसी वो, पहुँच गए भोपाल कि होली आई है. बच्चों को हम क्या समझाए ऐसे में, बाबा करें धमाल कि होली आई है. खेलें रंग कुंवारे देवर भाभी से, भैया हैं बेहाल कि होली आई है. पत्नी से […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल- भीगे मन का कोना-कोना

गाल गुलाबी लब पर लाली तन चाँदी मन सोना। इस होली पी के सँग भीगे मन का कोना-कोना।। मन प्यासा था मेघ प्यार का लेकर फागुन आया। अब तो आकर मेरे दिल में बीज प्यार के बोना।। लाज-शरम-मर्यादा कैसी मौसम भी तो देखो। तन से अंतर्मन तक भीगे यों तुम मुझे भिगोना।। रंगों की झीनी […]

पद्य साहित्य हाइकु/सेदोका

हाइकु

1 मिटती पीड़ा मिलते स्नेही-स्पर्श ओस उम्र सी । 2 ईर्षा वाग्दण्ड रिश्तो में डाले गांठ टूटे धागा सी 3 उलझा रिश्ता सुलझाये वागीश ऊन लच्छा सा 4 स्नेह की थापी बुझती वाड़वाग्नि मृतवत्सा की। 5 स्वयं का बैरी अति जल में लता मनु दुर्मदी