कविता

हम हमेशा साथ रहेंगे

हम हमेशा साथ रहेंगे हों चाहे पर्वत की ऊँचाइयाँ या फिर हों सागर की गहराइयाँ नदियों में दिखती हों परछाइयाँ हम सदा संग मिलकर बहेंगे हम हमेशा साथ रहेंगे….. हम हमेशा साथ रहेंगे हों चाहे नज़रों की अठखेलियाँ या फिर हों मन की मनमानियाँ रंग लाएँ जब अपनी रंगीनियाँ हम सदा संग मिलकर रंगेंगे हम […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

सोचने वाली बात

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः गुरु ही सब कुछ है।दुनिया में हर क्षेत्र में, कहीं भी सफलता पानी हो,एक अच्छे मार्गदर्शक की जरूरत होती है।कई बार गुरु हमें मनुष्य रूप में मिलते  हैं तो कई बार किसी और रूप में। हर मनुष्य को एक गुरु तो वरदान रूप में प्राप्त […]

सामाजिक

उत्तराधिकार

जो अपनी पहले वाली पीढ़ी से प्राप्त हो, वही उत्तराधिकार है। ये उत्तराधिकार की व्यापक परिभाषा है।अर्थ और संपत्ति प्रधान व्यवस्था जो मानव ने अत्यंत श्रम और उद्योग से स्थापित की है वहाँ उत्तराधिकार वो चल और अचल संपत्ति है जो किसी को माता पिता से प्राप्त हो।और अपने इस उत्तराधिकार को पाने के लिए […]

सामाजिक

क्या है हमारा?

हर साल 1 जनवरी को बार बार लोग सनातन संस्कृति का हवाला देकर नववर्ष का स्वागत करने से रोकते हैं लेकिन शायद ही वो अपनी कोशिश में एक प्रतिशत भी सफल होते हों । और तो और इस तरह की पोस्ट को सोशल मीडिया पर शेयर करने वाले भी उससे पहले सैकड़ों लोगों को नववर्ष […]

सामाजिक

बहते पत्थर

बहते पत्थर।पता है क्यूं? हम सब बहते पत्थर ही तो हैं।समय की नदी के साथ बहते हुए पत्थर।जैसे नदी अपने साथ अनगिनत पत्थर लेकर अपनी यात्रा शुरू करती है।हर एक पत्थर अलग-अलग तरह से घिसकर अपने रूप को बदलता जाता है, कुछ मन्दिरों में भगवान बनकर स्थापित हो जाते हैं, कुछ रेल की पटरी के […]

कविता

प्रवाह

न जाने वाले को जाने से रोक सकते हैं न आने वाले को आने से…… बस एक प्रवाह चलता है, पीछे से आगे; या आगे से पीछे भी? इसी के साथ चलती हैं सांसें जिसके साथ साथ चलते हैं हम आने वाला नया है जो चला गया वो पुराना जो बीता वही तो है अपना […]

लघुकथा

वो बस यात्रा

हम पहली बार साथ में सफ़र कर रहे थे। ऐसा नहीं था कि हमने पहले साथ में सफर नहीं किया था लेकिन जब भी किया था घर का कोई न कोई बड़ा साथ होता था।इसलिए हम साथ होकर भी साथ नहीं होते थे।शादी के बाद अब तक हमने सासु माँ और ससुर जी के साथ […]

सामाजिक

गुस्सा आता है

जाने क्यों आज गुस्सा उभर आया है मन में बात ही कुछ ऐसी है।बात है सशक्तिकरण की।किसके सशक्तिकरण की हो सकती है? वही जो असक्त है।क्यों असक्त हैं?बहुत से कारण हो सकते हैं,लेकिन आज एक महत्वपूर्ण कारण पर बात करते हैं। महिला हूँ इसलिए महिलाओं की अशक्तता को शिद्दत से महसूस कर सकती हूँ।आजादी बड़ा […]

लघुकथा

दूरी

जैसे ही साहब की गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया शीशराम दौड़ा। गाड़ी का दरवाजा खोला लेकिन ये क्या! पीछे की सीट खाली थी। आगे देखा तो साहब खुद ही ड्राइवर की सीट पर थे। दौड़ कर ड्राइवर वाले गेट की तरफ पहुंचा,जैसे ही गेट खोलने को हाथ बढ़ाया,साहब ने रुकने और पीछे हटने का इशारा […]

कविता पद्य साहित्य

धूल-मिट्टी

पत्तों पर जमी धूल,चिपटी है उनसे जैसे चिपटा है विकास मानव सभ्यता से.. टूट-टूटकर मिट्टी बदल गयी है धूल में, ये वही मिट्टी है जो बांध लिया करती थी सबको सबसे और जीवन को जीवन से और गढ़ देती थी हम सब की दुनिया आकार देती थी पेड़-पौधों को माँ जैसे वो मिट्टी बस थोड़ी […]