Category : पद्य साहित्य

  • पहली आवाज़

    पहली आवाज़

    कान पाते रहे कब से लेकिन उसकी किलकारी नहीं गूंजी खिलखिलाई नहीं कुछ तुतलाती सी आवाज कानो तक पहुंची “मम्म…मम्म “ अस्पष्ट ही लगे शब्द मगर यकीनन आवाज़ का प्रस्फुटन माँ शब्द से ही हुआ होगा...

  • इकरार

    इकरार

    आखिरी बारिश तक भींगती रही तुम मैं चुपचाप रहा अँधेरे की ओट में गीले ख़त उठाये थे मगर लफ्ज बिखरे थे इस कदर एक “इकरार” को जोड़ने में जमाना गुज़र गया -प्रशांत विप्लवी-

  • कुर्की

    कुर्की

    एक कुर्की में जप्त कुछ माल-असबाब गिरफ्त में ठिठुरते कई देह उन्हें देखने जुटी – एक भीड़ जुर्म ..ठीक-ठीक तय नहीं मगर असबाब का लिस्ट तैयार है बर्तन जूठे बर्तन टूटे बर्तन सूने बर्तन नहीं है...





  • ग़ज़ल-  ****चाह तुम्हारी****

    ग़ज़ल- ****चाह तुम्हारी****

    मुझको कितनी चाह तुम्हारी। हर पल देखूँ राह तुम्हारी।। मन करता है गीत सुनाऊँ। और सुनूँ मैं वाह तुम्हारी।। आहत दिल को कितनी राहत। देती एक निगाह तुम्हारी।। भूल न पाऊँ याद कभी भी. आह तुम्हारी...

  • देह भर शोर…

    देह भर शोर…

    पहला पड़ाव है मन जहां आकर ठहरती है कुछ पल को कामनाएं, प्रार्थनाएं—। मन उगाता है पेड़ कि जिसकी छाया उसके कद से बड़ी है फूलों के साथ खिलती हैं प्रार्थनाएं पत्तियों के साथ झरती हैं...

  • तांका { 5 / 7 / 5 / 7 / 7 }

    तांका { 5 / 7 / 5 / 7 / 7 }

    1 भेंट है मिला बड़े संघर्षों बाद स्वतंत्र देश प्रजातांत्रिक वेश विश्व अग्रणी केश 2 गुणन योग्य है मधुमय तोष देव की आस माँ के गोद में खेलें हिन्द देश में होती 3 देव का भेंट...