गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कैसे सदा दिल पे अपने पतझड़ ठहरेगा
हाल-ए-दिल हमारा किसी दिन तो सँवरेगा

आज तलक हमपे समाँ गुज़रा है जो हमदम
देखना कभी न कभी तुमपे भी वो गुज़रेगा

बूँद पलकों पे जो टिकी थी, बरस के बोली
कब तलक यूँही कोई ख़्याल मन में बिफरेगा

देखते हो जिसको आज सूली पर लटकते
वो ही शख़्स एक दिन मसीहा बन के उभरेगा

हैं जहाँ के रंग सभी “गीत” में हमारे
मन की हर इक पीड़ा से स्वर नया बिखरेगा

— प्रियंका अग्निहोत्री “गीत”

प्रियंका अग्निहोत्री 'गीत'

पुत्री श्रीमती पुष्पा अवस्थी