Author: डॉ. अशोक कुमार शर्मा

हाइकु/सेदोका

कोंपलें खिलें यही ज़िंदगी है

धीरे से बोली,सुबह की पहली किरण —“उठो, मुस्कुराओ।” ओस की बूँदें,फूलों से बातें करतीं,सपनों की भाषा। मिट्टी की गोद में,एक

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हाइकु/सेदोका

मृत्यु के पीछे छिपे हुए स्वार्थ

मौन सिसकियाँ हैं,धुएँ में गुम आहटें,कौन सुनता है। अंतिम साँसों में,स्वार्थ का जाल गहरा,मनुष्य अंधा। श्रद्धा के नीचे,लालच की परछाईं,छिपी

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हाइकु/सेदोका

नई सुबह होगी ज़रूर

ओस की बूँदेंहरे पत्तों पर चमकतींसपनों की राह पुरानी रात छिपीअंधकार धीरे-धीरेरोशनी मुस्काए नीली हवा बहतीझूलती हैं शाखें पेड़ों कीखुशियों

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हाइकु/सेदोका

गोवर्धन पूजा

गोवर्धन पर्वत,हरित मुकुट-सा नभ में,भक्ति की छाया। कृष्ण की मुस्कान,धरती का आशीर्वाद,मन में आलोक। गायों की रुनझुन,घंटों की मधुर तान,साँसों

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कविता

खोया गौरव को लौटाने की कोशिश

सूरज ढलता है,पुराने स्वप्न जागते,धरा भी रोती। हवा की सरगम,सन्नाटे में गीत गाती,भीतर का शोर। स्निग्ध धुंध छाई,स्मृतियों की परतें

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