दोहे…
मन का पंछी उड़ रहा, सपनों के आकाश। तन भौतिकता लीन है, कैद मोह के पाश॥ जीवन की परिकल्पना, अंतस
Read Moreसाँसे बहुत प्रतिक्षा रत हैं बाहें उत्सुक आलिंगन को प्रेम दीप आलोकित करके मन अभिलाषित मधुर मिलन को स्वप्न सजाए
Read Moreबोलते हैं झूठ लेकिन सच बताते हैं सभी सच यही है झूठ के गुणगान गाते हैं सभी जानता हूँ बोलता
Read Moreरोता और रुलाता क्यूँ है आँसू रोज बहाता क्यूँ है इतना दर्द दबाकर दिल में महफिल में मुस्काता क्यूँ है
Read Moreजन गण की आशाएं भी है जन मन की पीड़ाएं भी है दोनों की अपनी परिभाषा दोनों की अपनी मजबूरी
Read Moreसत्य के उजाड हो गये झूठ के दरख्त फल गये वक्त की है मार देखिये चाँदनी में हाथ जल गये
Read Moreपरंपराओं के पालक हम, धर्म गये क्यूँ भूल भारती पूछ रही छोड देश हित हुए सभी क्यूँ, निज हित में
Read Moreदिल में दिल का दर्द दबाये एक ज़माना बीत गया मेरे होठों को मुस्काये एक ज़माना बीत गया आवाजें देती
Read Moreधर्म के बढते हुए व्यापार में आग ये कैसी लगी बाजार में जल गये रिश्ते बचा कुछ भी नही नफ़रतों
Read Moreकभी सवाल तो कभी जवाब जैसी है हमारी ज़िन्दगी खुली किताब जैसी है हुई नसीब रोटियाँ किसी को मुश्किल से
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