अधूरी कॉपी का सच
शिक्षकीय जीवन में प्रतिदिन न जाने कितने चेहरे सामने आते हैं। कुछ चेहरे समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं,
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Read Moreबारिश कह रही थी मानो आज ही बरसना है, सिर्फ एक किलोमीटर दूर मंज़िल.. पर मंज़िल तक जाना ही सबसे
Read Moreमैं अपने बीमार और वृद्ध पिता को काशी के मुक्ति भवन ले जा रहा था। मन में एक ही उम्मीद
Read Moreऐसा पहली बार हुआ था कि नंदिनी घर से बाहर निकली और आदतन पलटकर पीछे देखा, पर उसे विदा करने
Read Moreऑफिस की लिफ्ट खराब थी। 8वीं मंजिल। बॉस ने सुबह ही कह दिया था – “रिपोर्ट आज चाहिए, नहीं तो
Read Moreगांव के बाहरी छोर पर बने उस पुराने घर में कभी बहुत रौनक हुआ करती थी। घर के आंगन में
Read Moreबुज़ुर्ग असलम साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी का एक-एक तिनका जोड़कर अपने इकलौते बेटे, फ़रहान, को इस क़ाबिल बनाया था
Read Moreशहर की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, ऊंची इमारतें और मसनूई रोशनियां कभी कभार इंसान को अंदर से बिल्कुल ख़ाली कर देती
Read Moreमेरे पिताजी छह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने उम्र से पहले जिम्मेदारियों का भारी बोझ अपने कंधों पर उठा
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