लघुकथा – आख़िरी निवाला
रेलवे स्टेशन की ठिठुरती रात में ठंड सिर्फ शरीर नहीं, इंसानियत भी जमा रही थी। लोग गर्म कपड़ों में लिपटे
Read Moreरेलवे स्टेशन की ठिठुरती रात में ठंड सिर्फ शरीर नहीं, इंसानियत भी जमा रही थी। लोग गर्म कपड़ों में लिपटे
Read Moreवादी-ए-कश्मीर की वह शाम अपनी पूरी रानाइयों के साथ ढल रही थी। पहाड़ों की ऊँची चोटियों पर जमी बर्फ़, डूबते
Read More“उफ्! ये चीटियाँ गर्मी आते ही बहुत परेशान करती हैं। रसोईघर तो है ही इनकी जागीर। अब किताबों की अलमारी
Read Moreवक़ार अहमद की ज़िंदगी अब एक ठहरी हुई झील की तरह थी। एक छोटा सा शहर, चंद वफ़ादार दोस्त और
Read More— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ सफ़र की शुरुआत रेलवे स्टेशन से नहीं, बल्कि घर के उस कच्चे आंगन से
Read Moreएक बार एक व्यक्ति कुछ पैसे निकलवाने के लिए बैंक में गया। जैसे ही कैशियर ने पेमेंट दी, कस्टमर ने
Read Moreअलमारी के सबसे पिछले हिस्से में, कपड़ों की तहों के नीचे दबे वो चंद नोट महज़ कागज़ के टुकड़े नहीं
Read Moreप्रीत एक सीधी सादी यूपी की रहने वाली लड़की थी। बात उन दिनों की है जब प्रयागराज इलाहाबाद हुआ करता
Read Moreरात के दस बजे थे। एक आलीशान रेस्टोरेंट में डोसा खाने का आर्डर दिया। जब साथ होती थी दिव्या। एक
Read Moreबचपन से ही आर्थिक धूप- छांव में पली नमिता । रोजमर्रा की जरूरते तो जरूर पूरा हो जाता लेकिन कभी
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