मजबूरी का किस्सा
गाँव निवाई में हर अमावस की रात एक अनजाना-सा डर उतर आता था. कच्ची पगडंडियाँ, घास-फूस के घर और दूर
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Read Moreक्या खूबसूरत विषय दिया है- ‘ वो भी क्या दिन थे- बिजली गुल और छत पर मेला’. सचमुच वो दिन
Read Moreरहमान और रेहाना दोनों खुश थे। जैसा एक-दूसरे को चाहते थे। वैसे ही मिले थे। हंसमुख स्वभाव के थे। दोनों
Read Moreबरसात की पहली शाम थी। कंक्रीट के ऊँचे जंगलों के बीच पानी सड़कों पर बह रहा था। गाड़ियों का शोर,
Read Moreमै आम बोल चाल की भाषा में लिखता हूँ। ठेठ लोकभाषा से सजी हुई रचनायें होती है। आम जनमानस में
Read Moreबचपन की कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि और अधिक चमकने लगती हैं। वे याद आते ही
Read Moreआज सुलेखा के पांव जमीं पर नहीं पड रहे थे। पाँखों में हौसले का बल भर ऊँची उड़ान भरने में
Read Moreआज के डिजिट्ल युग में, जहाँ संदेश उंगलियों की एक ‘टैप’ पर पहुँच जाते हैं, बीते दौर के वो नीले
Read Moreसत्या बहू भाग भाग कर सारी तैयारी कर रही थी। तभी किसी ने पीछे से कंधे पर हाथ रखा –
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