मोहन काका,साइकिल और वो बीस का नोट
बात उन दिनों की है जब कैलेंडर के पन्ने साल 1982 पर ठहरे हुए थे। मैं श्री नीलकंठेश्वर महाविद्यालय, खंडवा
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Read Moreआज सुबह से ही दिल बड़ी जोर से धड़क रहा था ना जाने क्यों ? रह रह कर तुम्हारा चेहरा
Read Moreकाली आँधी, तूफानी बारीश, घनघोर अँधेरा। कड़कड़ाती बिजली, बादलों की गड़गड़ाहट। झमाझम बरसती बूँदे और तेज हवा से महक का
Read Moreवृद्धाश्रम में रहने वाले एक बुज़ुर्ग रोज़ सुबह सबसे पहले रजिस्टर खोलते और अपने काँपते हाथों से अपने नाम के
Read Moreपति की मृत्यु के बाद शिला ने कारोबार का सारा बोझ अपने सिर ले लिया। आखिर करती भी क्या, पेट
Read Moreपढ़ाई में होशियार नवोदित धाविका सीता के सपने बड़े थे, मगर परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। जूनियर वर्ग
Read Moreमैं उस दिन स्कूल में बतौर परीक्षक-इम्तिहान मौजूद था। स्कूल के हॉल में ख़ामोशी का राज़ था, सिर्फ़ क़लम के
Read Moreकॉलेज का पहला दिन आज भी याद है। नए चेहरे, नई कक्षाएँ और दिल में अनगिनत सपने। शुरुआत में सब
Read Moreहर वर्ष की भांति इस बार भी माहेश्वरी जी अनाथ कन्याओं के कन्यादान का पुनीत कार्य कर रही थीं। विवाह
Read More“मम्मी, अभी नहीं… शाम को ले आएँगे।” मेरे इतना कहते ही माँ की आँखें कहीं दूर टिक गईं। धीमे स्वर
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