कविता

अनकही व्यथा

बिटिया थी दुलारी अपने माँ बाबा की बहना थी प्यारी अपने भाई बहना की पर लगी नज़र ऐसी जकड़ लिया अपने पंजों में दानवों ने कर के हरण किया दुष्कर्म कर कर के तार तार मासूमियत और इज़्ज़त मेरी इतने पर भी न भरा मन तोड़ दी गर्दन की हड्डी काट दी जुबान छोड़ यूँ […]

सामाजिक

भाई भतीजावाद, पक्षपात

Napotism जिसे आसान भाषा में कहें तो भाई भतीजा वाद, Favoritism पक्षपात, Groupism गुटबाज़ी किसी को आगे बढ़ाना, किसी को पीछे धकेलना, किसी को ज़रूरत से ज़्यादा पसंद करना , किसी को नकारते रहना …..ये सारी चीजें तो शायद जन्म से ही शुरू हो जाती हैं घर परिवार, आसपास का माहौल, स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, रिश्तों […]

कविता

शहरों से अच्छे अपने गांव

शहरों से अच्छे अपने गांव जहां आज भी प्यार और रिश्ते जिंदा हैं लोग एक दूसरे की खुशी में हाथ बंटाते हैं और दुःख में ही साथ खड़े रहते हैं शहरों जैसे नहीं साथ या सामने वाले घर का पता नहीं होता तो दुःख सुख साथ की तो बात ही क्या गाँव भी आज भी […]

कविता

वो सड़क का मोड़

वो सड़क का मोड़ आज भी उदास तन्हा शांत बेबस है मन के जैसे जहां से तुम गये थे होकर जुदा हम से … न रही कोई चहक न रही कोई महक न रहा कोई सवाल न रहा कोई जवाब बस बिखरी रहती है बेनाम सी उदासी इस सड़क के सन्नाटे जैसी एक टक अक्सर […]

सामाजिक

रंगभेद

रंगभेद यानी श्वेत अश्वेत (गोरे काले) की लड़ाई न जाने कितने सालों से चली आ रही। इस ज्वलंत मुद्दे को उठा कर उस पर कार्य करने की नेल्सन मंडेला की बेहद ही अहम भूमिका रही है। पर सदियों से चला आ रहा रंगभेद का मुद्दा कभी थमा ही नहीं। जब बैरक ओबामा ने  अमेरिका की […]

सामाजिक

चकाचौंध बनाम अंधेरा

ये बात तो हमने अक्सर सुनी ही है “चिराग तले अंधेरा” और “चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते हैं”। शायद चकाचौंध से लेस फ़िल्म , टेलीविजन इंडस्ट्री , ग्लैमर , फैशन दुनिया की भी यही कहानी है। जो बाहर से जितनी चमकदार और उजली नज़र आती है अंदर से उतनी ही काली। नाम, शोहरत,पैसा, बनते […]

सामाजिक

प्रवासी मज़दूर

रोज़ सुबह उठकर कोई अपने निजी काम पर निकलता, कोई खेतों पर, कोई कारखाने, कोई फैक्टरी, कोई ढाबे, कोई होटल, कोई बेलदारी करता, कोई घर बनाता, कोई सड़क, कोई इमारत, कोई फ्लाईओवर इस तरह देश के कोने कोने में न जाने कितने ही मज़दूर अपनी रोज़ी रोटी कमा रहे थे। कोरोना और लॉक डाउन क्या […]

कविता

कविता

समय ने चली ये कैसी उल्टी चाल कैद हुए इंसा घरों में और स्वछंद घूम रहे जानवर कहीं नील गाय कहीं पेंगुइन्स कहीं हाथी कहीं हिरण कहीं बतखें बड़े आराम से हुआ अजब समय का फेर इंसा बंद हुए घरों में अपने महामारी के चलते और पंछी, जानवर ले रहे मज़ा खुले वातावरण का सालों […]

सामाजिक

जनता कर्फ्यू से लॉकडाउन की डगर

19 तारिक को जब ये ऐलान किया गया की 22 तारीख को जनता कर्फ्यू होगा जिसे समस्त  जनता को हर प्रदेश, राज्य में पालन करना है और सायं 5 बजे अपने अपने घरों से निकलकर ताली, थाली आदि द्वारा जन सेवा में लगे डॉक्टर, नर्सस, पुलिस, सफाई कर्मचारियों आदि अन्य सभी जन सेवाओं में इस […]

कविता

लो चल पड़ी कलम

जब भी दिल दुखा कह न पाये मन की बात शब्द बने मनमीत लो चल पड़ी कलम।। जब भी द्रवित हुआ मन देख आपदा, विपदा आतंक, अत्याचार, घटना दिल भर आया आँखे हुई नम लो चल पड़ी कलम करती बयान अनकहे जज़्बात।। जब मौसम ने ली अंगड़ाई बहने लगी शीत बयार या रिमझिम हुई बरसात […]