नवीनतम लेख/रचना


  • **** तुम न आये ****

    **** तुम न आये ****

    प्रेम की परिभाषा कभी विरह तो कभी मिलन नए तराने नए अफ़साने वो उलझे रिश्ते आये न जो तुम कभी सुलझाने वो भूले गीत वो भूली यादें एक पल हँसना पल में रूठ जाना चिंतन तो...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    जिसको धूप का डर रहता है, वो अपने घर पर रहता है। ये गुर्बत है प्यारे, इसमें, सुबहो-शाम सफर रहता है। तन में दिल और दिल में तू है, घर के अंदर घर रहता है। हवस...



  • मुक्तक

    रातों को चाँद सितारों से कहते हम अपने अफसाने पलकों की ठंडी सेजों पर जो स्वप्न सजाये अनजाने होंठों से बाहर आ न सकी छिप गईं हृदय के कोने में तेरे मेरे मन की बातें या...

  • श्रमिक गीत

    श्रमिक गीत

    जैसे रूई धुनें जुलाहे श्रमिक अंधेरों को धुनते हैं, किरणों की चादर बुनते हैं। एक उम्र के जितनी लंबी दुर्घटना बन कर जीते हैं सब कुछ पाकर भी रीते हैं, पंछी बन कर तिनका तिनका निज...

  • मोहब्बत

    मोहब्बत

    मोहब्बत की उम्मीद पे ही जिन्दगी सँवरती है झुकी – झुकी नजरों में मोहब्बत बसीं रहती है मोहब्बत में ही सब कुछ बयां हो जाता है यारों इशारे ही सबकुछ है जो लबों पे नहीं आती...

  • अंतर द्वन्द

    अंतर द्वन्द

        तन से नंगी, भूख से पीड़ित  भावी को जब रोटी के टुकड़े पर लड़ते देखता हूँ, मै इसका कारण सोचता हूँ, मैं इसका….।   लालच  की  आँधी में  हर  नैतिकता  को जब मानवता, सुचिता...

  • बदली

    बदली

    अंबर की काली चादर मेँ छायी कुछ ऐँसी बदली, चंद्रकिरण हैँ बहकी बहकी तारोँ की आशा मचली। मेघोँ ने अंबर को घेरा घोर घटा बन छाए हैँ, कलतक मँडराते जो काले बने श्वेत घन आए हैँ, और...

कविता