Author: डॉ. अशोक कुमार शर्मा

हाइकु/सेदोका

जज़्बात को अल्फ़ाज़ न समझें

चुप नदी बहतीशब्दों में न समाए भावहृदय फुसफुसाता पतझड़ की पत्तियाँभावनाएँ चुपचाप गिरेंअदृश्य पर गहरी सुबह की ओस चमकेआनंद के

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हाइकु/सेदोका

अन्त में सिर्फ अन्त ही होता है

ढलती धूप कहेपत्तों पर अंतिम स्पर्शसमय मुस्काए शाख से गिरकरपत्ता धरती से मिलेचक्र पूर्ण हुआ साँझ की निस्तब्धपगडंडी सुनसान हैकदम

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हाइकु/सेदोका

पतों से हो गई है रिश्तों की उम्र

पतझड़ की हवा,रिश्तों के रंग उड़े,साँसें गुम हो गईं। सूखे पत्तों में,बीती यादें बिखरी हैं,हृदय रोता है। सन्नाटा छाया,बातें अधूरी

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