भीतर बैठे भेड़िए
कॉकरोच को तुच्छ कह, भरते मन अभिमान।भीतर बैठे भेड़िए, ऊपर मीठी तान।। लोमड़ जैसी चाल से, करते रोज़ शिकार,गिरगिट जैसे
Read Moreकॉकरोच को तुच्छ कह, भरते मन अभिमान।भीतर बैठे भेड़िए, ऊपर मीठी तान।। लोमड़ जैसी चाल से, करते रोज़ शिकार,गिरगिट जैसे
Read Moreलिखने वाले बढ़ गए, घटते गए विचार।बिन पढ़े ही बन रहे, मंचों के सरदार।। दो पंक्ति फेसबुक लिखी, बन बैठे
Read Moreकॉकरोच कहकर जिन्हें, समझा था कमजोर।डिजिटल होते दौर में, वही बने सिरमौर॥ मीमों वाली चोट से, हिलने लगे विचार,हँसते-हँसते बोलते,
Read Moreचाहा उन्हें समुद्र दें, वे निकले बदहाल।तालाबों में बिक गई, उनकी सारी चाल॥ जिनको सींचा प्रेम से, देकर अपना खून,वही
Read Moreसुख-दुख तो हैं आते-जाते, जीवन पथ संगीत सुनाते।समझ इसे हम सब कब पाते, बाद बहुत नाहक पछताते।। इसका जीवन खेल
Read Moreजब से आई गाँव में, ये शहरी सौगात।मेड़ करें ना खेत से, आपस में अब बात।। पीपल वाली छाँव भी,
Read Moreतू भी पायेगा कभी, फूलों की सौगात।धुन अपनी मत छोड़ना, सुधरेंगे हालात॥ काँटों वाली राह में, रखना मन विश्वास,मेहनत की
Read Moreनन्हे पग की चंचलता, भैया की मुस्कान,घर के छोटे आँगन में, बसता सारा जहान॥ बिस्तर बन गया खेलघर, हँसी बनी
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