लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 5)
उस समय तक संध्या घिर आयी थी, अँधेरा होने को ही था। भरत जी जानते थे कि महाराज दशरथ इस
Read Moreउस समय तक संध्या घिर आयी थी, अँधेरा होने को ही था। भरत जी जानते थे कि महाराज दशरथ इस
Read Moreसावन की रिमझिम बारिश, खेतों की हरियाली, पीपल के पेड़ पर पड़े झूले, और औरतों के गीतों की गूंज —
Read Moreयूनिवर्सिटी के दिनों में वे दोनों साथ पढ़ते थे। दोस्ती धीरे-धीरे मोहब्बत में बदल गई और दोनों ने शादी कर
Read Moreभरत जी ने उसी समय अपने नाना जी के पास जाकर दूतों द्वारा लाया गया सन्देश सुनाया और अयोध्या से
Read Moreज्वाइस की कही बात ने मुझे किस कदर राहत पहुंचाई थी ये लफ़्ज़ों में बयां करना मुमकिन नहीं था। करवट
Read Moreकोख में किसी बच्चे की पहली चीख, बाहर आने के बाद की नहीं होती। वह तो भीतर ही कहीं, सिसकती,
Read Moreअवध से केकय तक का सारा मार्ग उन दूतों द्वारा देखा हुआ था। वे वहाँ पहले भी जा चुके थे।
Read More“दादी सा, मेरे साथ रसोई घर में आईए ना। मुझे मिठाई बनाना नहीं आता है। राखीपूनम मनाने बाईसा आयेंगे। घर
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