जले हुए घर की पीड़ा
जलकर खाक मकान है, रोए हर दीवार।माफ़ी से कब जुड़ सके, टूटा अब संसार॥ चूल्हे, चौखट, छत जली, जले सभी
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Read Moreचलन बहू का क्या कहूं, फूटी है तकदीर।घर में मुझको मिल गई, बेढंगी तस्वीर।।१. घूंघट में थी सादगी, उसे बताएं
Read Moreअख़बारों में कुछ बचा, ज़िंदा ज़मीर आज।तारीख़ और वार का, रखते जो अंदाज़।। मौत ज़मीरों की हुई, कैसी उठी पुकार।सच
Read Moreधरती माता सह रही, मानव अत्याचार।पेड़ कटे तो घट रहा, जीवन का आधार।। बादल गरजे दूर से, बरसे मीठी धार।सूखी
Read Moreतप्त धूप अब कह रही, सुनो धरा की पीर।सूखे वन-उपवन हुए, रोए झरने-नीर।। सूरज अग्नि उगल रहा, झुलसे सब इंसान।छाँव
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