मुक्तक
तुम जम जम के पानी जैसे लगते हो।मधुशाला के साकी जैसे लगते हो।बेमतलब में जब गुस्सा हो जाते हो,गर्म चाय
Read Moreजेठ दुपहरी आग सी, झुलसे खेत-खलिहान।पारा चढ़कर बोलता, व्याकुल हुआ जहान॥ सूरज बरसे आग जब, तपे धरा आकाश।पारा हुआ पचास
Read Moreबूँद-बूँद से सिंधु है, बूँदों से संसार।जल बिन सूना ये जगत, जल से ही उद्धार॥ सूखे नद-नाले सभी, प्यासा हुआ
Read Moreकुर्सी से सदैव करें, जो भी प्यार दुलारवही नेता स्वयं का, रमेश करें उद्धार कुर्सी छिनने वास्ते, रहता है तैयारहरदम
Read More॥दोहा॥ ममता सागर रूप तू, करुणा की पहचान।माँ तेरे चरणों में बसे, मेरा सारा मान॥तन-मन-धन सब वार दूँ, तुझ पर
Read More