गीतिका/ग़ज़ल

तेरे हुस्न से…

  तेरे हुस्न से पिरोया अशआर हूँ मैं तेरी ही चाहत का हूबहू इजहार हूँ मैं मुझे यूँ ही भूला देना आसान नहीं हैं तुझ पर इतना ज्यादा निसार हूँ मैं दीदह ओ दिल में तुम्ही समाये रहते हो इश्क़ में जिस्म ओ जाँ से सरशार हूँ मैं तुम लौट कर ज़रूर आओगे एक दिन […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

आँखों में उनके दीदार की हसरत लिए हुए राहों में पलकें बिछाये जानें कब से बैठे हैं बह न जाये आँसूओं संग कहीं तस्वीर उनकी आँखों में सैलाब छुपाये जाने कब से बैठे हैं लौट न जायें कहीं वो देखकर घर में अँधेरा चरागो को रौशन किये हुए जाने कब से बैठे हैं दिन तो […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ख्वाब फिर अंगड़ाई लेकर आ रहे हैं। दर्द की परछाईं लेकर आ रहे हैं। दर्द की कैसे दवा मुझको मिलेगी, इस कदर महंगाई लेकर आ रहे हैं। भीड़ में भी हर घड़ी तनहा करे, हर लम्हा तन्हाई लेकर आ रहें हैं। मुझको ठोकर मार जो आगे बढे, मेरी खातिर खाई लेकर आ रहे हैं। लूटकर […]

गीतिका/ग़ज़ल

गजल : अंधेरों से अब दोस्ती हो गई

कितनी तन्हा आज जिंदगी हो गई , अंधेरों से अब दोस्ती हो गई, उजालों में जीकर भी देख लिया हमने, फिर क्यूँ हर शम्मा बेवफा हो गई l   मंझधार से तो ले आया था अपनी कश्ती को, फिर क्यूँ साहिल से दूरियां हो गई, ख्याबों की दुनिया में रहा करता था पहले, मगर सच्चाइयों […]

गीतिका/ग़ज़ल

मैंने किया था …

  मैंने किया था तुम्हें फोन मगर तुमने सुना नहीं अपने ख्यालों में मुझे तुमने आज बुना नहीं तुझे भेजा था जो खत वो उदास हो लौट आया है मेरे मन की तरह किसी का मन आज सूना नहीं उल्फ़त में तुमने अजीब सी एक शर्त रखी है देखना जीभर मगर कहा कभी मुझे छूना […]

गीतिका/ग़ज़ल

अभिमन्यु वध

अभिमन्यु का वध हो गया, एक बार फिर दिल्ली में, सभी विरोधी हुए इकट्ठा, एक बार फिर दिल्ली में। मुस्लिम तुष्टिकरण की बातें, इस्लामिक मुल्कों से चन्दा, देख रही थी सारी दुनिया,एक बार फिर दिल्ली में। नहीं जरुरत कोई काम की, मुफ्त में बिजली- पानी लो, झाड़ू ने समझाया सबको, एक बार फिर दिल्ली में। […]

गीतिका/ग़ज़ल

तेरे इश्क़ में….

  तेरे इश्क़ में हसरत ए परवाज अभी बाकी है गमे हिज्र में हूँ ,वस्ल का आगाज़ अभी बाकी है तेरी ख़ामोशी ने जो कहा उसे मैंने सुन लिया है मेरे सीने में दफ़न वो एक राज अभी बाकी है मेरे बिना न तुम रह सकते हो न तेरे बिना मैं मेरे ख्याल में तेरे […]

गीतिका/ग़ज़ल

तेरे पास तो….

  तेरे पास तो मुहब्बत बेपनाह है मेरे लिए तेरा सुन्दर चेहरा जैसे माह है मेरे लिए इश्क़ कुर्बत नहीं है वह एहतिराम इबादत है फासिले में रहूँ तुझे छूना गुनाह है मेरे लिए कभी कोहरे सा कभी बादलों सा आ जाते हो तेरी बेकरार सी परछाई हमराह है मेरे लिए मुझे भोर तक तारे […]

गीतिका/ग़ज़ल

वृक्षों तले छाँव भी…

  वृक्षों तले छाँव भी रह रहे किराये से, लगने लगे हैं शहर में लोग कुछ ज्यादा ही पराये से ,लगने लगे है मनुष्य होने के अलावा लोग न जाने क्या हो गए हैं आडम्बर वे कुछ ज्यादा ही अपनाये से,लगने लगे हैं बरसों पुराने मील के पत्थरों से अब कौन मिले तन्हाई से घिरे […]

गीतिका/ग़ज़ल

झरने लगे हैं आँख से भी चांदनी के फूल

झरते तुम्हारी आँख से जानम नमी के फूल, खिलने लगे हैं दिल में मेरे तिश्नगी के फूल भटके न राहगीर कोई राह प्यार की, रक्खे हैं हमने रहगुज़र में रौशनी के फूल दिल में तुम्हारी याद का जो चाँद खिल गया, झरने लगे हैं आँख से भी चांदनी के फूल अपना लिए हैं जब से […]