हाइकु/सेदोका

हाइकु (नव-दुर्गा)

हाइकु (नव-दुर्गा)P शैलपुत्री माँ हिम गिरि तनया वांछित-लाभा। ** ब्रह्मचारिणी कटु तप चारिणी वैराग्य दात्री। ** माँ चन्द्रघण्टा शशि सम शीतला शांति प्रदाता। ** चौथी कूष्माण्डा माँ ब्रह्मांड सृजेता उन्नति दाता। ** श्री स्कंदमाता कार्तिकेय की माता वृत्ति निरोधा। ** माँ कात्यायनी कात्यायन तनया पुरुषार्थ दा। ** कालरात्रि माँ तम-निशा स्वरूपा भय विमुक्ता। ** माँ […]

पद्य साहित्य हाइकु/सेदोका

नवरात्रि के हाइकु

नवरात्रि के हाइकु   01 दक्ष नाशिनी बहुवर्णी देवि मां भव मोचनी। 02 ऐन्द्री कौमारी वाराही माहेश्वरी विशाला ग्राही। 03 मां उत्कर्षिणी चण्डमुण्ड मारिणी सर्वास्त्रधरिणी। 04 शंकर वरी कुमारी कन्या शैवा ज्वालदंशिनी। 05 रौद्र रूप हो काल कराली काली कालरात्रि हो। 06 ब्रह्म की छाया शिवदूती प्रत्यक्षा तपस्वी माया। 07 हो नारायणी भद्रकाली मां तुम […]

हाइकु/सेदोका

“मरा नहीं है जोश”

चन्द्रयान पर उतरना, एक कदम था दूर। किन्तु जरा सी चूक से, हुआ देश मजबूर।। — विफल हुए तो क्या हुआ, मरा नहीं है जोश। अन्तरिक्ष विज्ञान का, पास हमारे कोश।। — चन्द्रयान की विफलता, अन्तिम नहीं पड़ाव। और अधिक है बढ़ गया, अब तो चन्द्र-जुड़ाव।। — एक विफलता से नहीं, मानेंगे हम हार। जग […]

पद्य साहित्य हाइकु/सेदोका

कुछ हाइकु

कुछ हाइकु 01 – पाक हंसता अपनों की वृद्धि से पराये घर। 02- आजादी पर्व जुड़कर जन्मते हमको गर्व। 03- तिगड़मबाज शत्रु को रिझाते कल या आज। 04 – भारत देश कुछ से है अजूबा गीदड़ी वेश। 05 – रेश ही रेश जयचन्द बनेंगे हमारे देश। 06 – देश की भक्ति नापने का पैमाना उनकी […]

हाइकु/सेदोका

हाईकू

प्रीत मिलन मधुरमय बेला करे पुकार! नई उमंग मन मे है तरंग हुई मगन ! सुनी डगर निहारते सनम मिले कदम! लोग बेगाने बने इस तरह मिले सबक! अजनबी ये मन करता दुआ शुक्रिया तेरा? बिजया लक्ष्मी

हाइकु/सेदोका

समसामयिक विषय पर हाइकु

01ः- अहं का खेल मुद्दे पाताल में हम हैं फेल। 02 :- तू- तू में-में ही बन लिया कर्तव्य अपनों ने भी। 03ः- ऊर्जा खपायी सालों की पूंजी ज्ञान पढ़ी पढ़ायी। 04 :- बुलबुले सा क्रोध भी हमारा है लाये हताशा। 05 :- वाक पटुता ज्ञानी भी हो अज्ञानी न संभलता।

हाइकु/सेदोका

हाइकु

ठंडी की ऋतु घर घर अलाव बुझती आग।।-1 गैस का चूल्हा न आग न अलाव ठिठुरे हाथ।।-2 नया जमाना सुलगता हीटर धुआँ अलाव।।-3 नोटा का कोटा असर दिखलाया मुरझा फूल।।-4 खिला गुलाब उलझा हुआ काँटा मूर्छित मन।।-5 — महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी