लघुकथा – अपूर्ण विराम
“नगर निगम का बुलडोज़र ठीक आठ बजे पहुँचा। भीड़ तमाशा देखने खड़ी थी, पर एक बूढ़ा आदमी अपनी जर्जर किताबों
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Read Moreबारिश की शाम थी। शहर के एक छोटे से कैफ़े में हर रोज़ ठीक पाँच बजे एक बुज़ुर्ग आते थे।वो
Read Moreजब-जब घर की याद आती वह विह्वल हो वृद्धाश्रम से दूर घूमने निकल जाते थे । आज भी सुबह-सुबह घूमते-घूमते
Read Moreविद्यालय का वार्षिक उत्सव समाप्त हुआ और के.जी. में पढ़ने वाली नन्ही मिनी भागकर मीनाक्षी के गले आ लगी। “मम्मी!
Read Moreराघव एक साधारण किसान परिवार का युवक था, जो सेना में भर्ती होकर देश की सीमा पर तैनात हो गया
Read Moreमेरी कॉलोनी में रहने वाले एक वृद्ध की दिनचर्या वर्षों से नहीं बदली थी। हर शाम वह चारपाई पर बैठकर
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