लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 13)
जब सुमन्त्र जी को निषादराज गुह के आने की सूचना मिली, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और उनको खेद भी
Read Moreजब सुमन्त्र जी को निषादराज गुह के आने की सूचना मिली, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और उनको खेद भी
Read Moreअहमदाबाद की बारिश जैसे शहर को नहीं, रागिनी के भीतर के सूनेपन को भिगो रही थी। खिड़की के बाहर रुक-रुक
Read Moreवृंदावन की संकरी गलियों में धूप आग उगल रही थी। मंदिर के सामने, आठ साल की गुड़िया माथे पर पसीना
Read Moreभरत जी ने एक दिन पूर्व ही अपने कुशल कर्मचारियों को भेजकर मार्ग की बाधाओं (गड्ढों, झाडियों, पत्थरों आदि) को
Read Moreगुरु वशिष्ठ जी की बात का उत्तर देकर भरत जी ने सुमन्त्र जी से कहा- “सुमन्त्र जी! आप शीघ्र जाइए
Read Moreअयोध्या से शृंगवेरपुर तक का मार्ग सुधारने का आदेश पाते ही विशेषज्ञों और कुशल श्रमिकों का दल अपने साथ आवश्यक
Read Moreकभी-कभी ज़िंदगी के सबसे बड़े सबक किसी स्कूल या किताब से नहीं, बल्कि एक साधारण से घर में, एक सादी-सी
Read Moreतेरहवें दिन के कार्य पूर्ण करने के बाद शोकसंतप्त राजकुमार भरत जी से उनके छोटे भाई शत्रुघ्न जी इस प्रकार
Read Moreप्रातःकाल होते ही वहाँ मुनि वशिष्ठ जी उपस्थित हो गये। उन्होंने शोकग्रस्त भरत जी को सांत्वना दी और कहा- “यशस्वी
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