अक़्स और परछाइयाँ
वक़ार अहमद की ज़िंदगी अब एक ठहरी हुई झील की तरह थी। एक छोटा सा शहर, चंद वफ़ादार दोस्त और
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Read More— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ सफ़र की शुरुआत रेलवे स्टेशन से नहीं, बल्कि घर के उस कच्चे आंगन से
Read Moreएक बार एक व्यक्ति कुछ पैसे निकलवाने के लिए बैंक में गया। जैसे ही कैशियर ने पेमेंट दी, कस्टमर ने
Read Moreअलमारी के सबसे पिछले हिस्से में, कपड़ों की तहों के नीचे दबे वो चंद नोट महज़ कागज़ के टुकड़े नहीं
Read Moreप्रीत एक सीधी सादी यूपी की रहने वाली लड़की थी। बात उन दिनों की है जब प्रयागराज इलाहाबाद हुआ करता
Read Moreरात के दस बजे थे। एक आलीशान रेस्टोरेंट में डोसा खाने का आर्डर दिया। जब साथ होती थी दिव्या। एक
Read Moreबचपन से ही आर्थिक धूप- छांव में पली नमिता । रोजमर्रा की जरूरते तो जरूर पूरा हो जाता लेकिन कभी
Read Moreविकास ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उसे सब कुछ छोड़कर भागना पड़ेगा। दुबई की चमचमाती इमारतों के
Read Moreडॉ. विनोद शर्मा ने छत्तीस घंटे जागकर परीक्षा दी थी। रैंक आई — 47वीं। सीट नहीं मिली।जिसे मिली, उसकी रैंक
Read Moreबरसों बीत गए थे, यादों की धूल ने उन रास्तों को धुंधला कर दिया था जिन पर हम कभी साथ
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