लघुकथा – संस्कार
“माँ हमने जमीन लेनी की सोची है।चलिए हमारे साथ ,आप भी एक बार जमीन देख लीजिए।”छोटे बेटे ने कहा।“अरे भई,
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Read Moreतुमसे प्यार करने के बाद तो हमने जीना सीखा है। सागर तट पर अपने प्रियतम सौरभ के कंधे पर सिर
Read Moreसुबह सुबह के सूरज की अल्हड़ किरणें घर के छोटे से जँगले के किवाड़ की झीरी में से घर के
Read Moreदिसंबर का महीना घोर सर्दियों के दिन।मैं कमरे में बैठा हीटर सेंक रहा था और टीवी पर समाचार देख रहा
Read Moreबहुत बडी सभा चल रही थी । नारियों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर सारा देश चिन्तित था । कहीं
Read Moreमैं आँगन में कपड़े सूखा रही थी कि एक प्यारी सी आवाज सुनाई दी-“आंटी आपका पोस्टल पार्सल है।’मैंने पीछे पलट
Read Moreसरल सहज व्यक्तित्व के धनी, प्रेरक व्यक्तित्व ग्रामीण चेतना, सामाजिक सरोकारों एवं जनहितकारी पत्रकारिता के साथ साहित्यिक के प्रति प्रतिबद्ध,
Read Moreसेठानी ने सेठजी से पूछा -” खाना खा लिया। “सेठजी गल्ले की चाभी दराज में रखते हुए बोले – ”
Read Moreसमय कितना बदल रहा है ! पहले माता पिता शादियां तय करते थे फिर संतान के मोह में लिव-इन रिलेशनशिप
Read Moreबहुत दिमाग ख़राब हो गया था अनारे बाबू का . स्टाफ वाले बड़े बाबू ने पार्टी दी थी . उनके
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