बारिश, कश्ती और बचपन
बरसात की पहली शाम थी। कंक्रीट के ऊँचे जंगलों के बीच पानी सड़कों पर बह रहा था। गाड़ियों का शोर,
Read Moreबरसात की पहली शाम थी। कंक्रीट के ऊँचे जंगलों के बीच पानी सड़कों पर बह रहा था। गाड़ियों का शोर,
Read Moreमै आम बोल चाल की भाषा में लिखता हूँ। ठेठ लोकभाषा से सजी हुई रचनायें होती है। आम जनमानस में
Read Moreबचपन की कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि और अधिक चमकने लगती हैं। वे याद आते ही
Read Moreआज सुलेखा के पांव जमीं पर नहीं पड रहे थे। पाँखों में हौसले का बल भर ऊँची उड़ान भरने में
Read Moreआज के डिजिट्ल युग में, जहाँ संदेश उंगलियों की एक ‘टैप’ पर पहुँच जाते हैं, बीते दौर के वो नीले
Read Moreसत्या बहू भाग भाग कर सारी तैयारी कर रही थी। तभी किसी ने पीछे से कंधे पर हाथ रखा –
Read Moreरेलवे स्टेशन की ठिठुरती रात में ठंड सिर्फ शरीर नहीं, इंसानियत भी जमा रही थी। लोग गर्म कपड़ों में लिपटे
Read Moreवादी-ए-कश्मीर की वह शाम अपनी पूरी रानाइयों के साथ ढल रही थी। पहाड़ों की ऊँची चोटियों पर जमी बर्फ़, डूबते
Read More“उफ्! ये चीटियाँ गर्मी आते ही बहुत परेशान करती हैं। रसोईघर तो है ही इनकी जागीर। अब किताबों की अलमारी
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