जर्जर कश्ती हो गई
जर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार,खतरे में ‘सौरभ’ दिखे, जाना सागर पार॥ लहरों का प्रहार है, उठता बारंबार,डगमग करती नाव
Read Moreजर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार,खतरे में ‘सौरभ’ दिखे, जाना सागर पार॥ लहरों का प्रहार है, उठता बारंबार,डगमग करती नाव
Read Moreयोगी भोगी हो गए, संत चले बाजार।अबलाएँ मठ-लोक से, रह-रह करें पुकार॥ माटी की मर्याद भी, हुई आज बेहाल,धर्म-ध्वजा के
Read Moreअपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल।बूढ़ा पीपल है कहाँ, गई कहाँ चौपाल॥ माटी की सोंधी महक, अब लगती
Read Moreस्याही, कलम, दवात से, सजने थे जो हाथ।कूड़ा-करकट बीनते, नाप रहे फुटपाथ।। जिन आँखों में स्वप्न थे, पढ़ने के अरमान।धूल
Read Moreमूक हुई किलकारियाँ, गुम बच्चों की रेल।गूगल में अब खो गये, बचपन के सब खेल॥ आँगन सूना हो गया, चुप
Read Moreदो प्रेम के मीठे से बोल डाल दे थके बदन में जान,ये मजदूर चाहता है तुमसे बस थोड़ा सा सम्मान
Read Moreकर्ज गरीबों का घटा, कहे भले सरकार।सौरभ के खाते रही, बाक़ी वही उधार॥ कागज़ पर समृद्धि लिखी, सूना हर बाज़ार।चूल्हे
Read Moreजिन्हें पहुँचाया शिखर तक, हमने थामे हाथ।वही आज समझा रहे, हमको अपनी बात॥ हमसे सीखी राह थी, चलना हरदम साथ।वही
Read Moreमन के भीतर कोई छुपकेधीरे-धीरे गाता है,मौन बने उस संवादों मेंसच अपना मिल जाता है॥ (1)शोर बहुत है इस दुनिया
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