कविता

कविता

प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषित

हर तरफ से हो रहा प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषित,असंख्य आपदाएं विपदाएं झेल रहे हैं किसान,कंक्रीटों का बिछ रहा जाल प्रदूषित वातावरण,मौसम

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कविता

मुक्ति

मुक्तिसम्भव नहींवर्तमान सेअतीत सेऔर भविष्य से भी। बन्धनों में रहकर भीमुक्त रहनासाधना है।अच्छे वस्त्रआभूषणअथवामाला कंठीधारण कर भीउसमें लिप्त न होनामुक्ति

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