शाम तो ढल जाने दे
न रोक ए हम नवा अब मेरे आंसू,आंखों से ये समन्दर तो निकल जाने दे।जुल्फों की घनी छाओं की चाहत
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Read Moreकाम तो राम ही आयेंगेयह तो हम सबको पता है,पर ज्यादा भरोसा नहीं है।क्योंकि हम खुद को राम समझते हैं,राम
Read Moreबहे जा रहे हैं धारा के संग,अपनी ही मस्ती, अपने ही रंग।भूल गए हैं यह सरल-सी बात—इन राहों में हैं
Read Moreपुरानी आदतों के अभ्यस्त,इतनी चिताओं में हो ग्रस्त,अच्छा स्वास्थ्य श्रेष्ठ संपदा,जिंदगी में अपने रहो मस्त । दिनचर्या न हो अस्त-व्यस्त,वरना
Read Moreकुछ लोग भाईचारा बोने में माहिर होते हैं,और उसी भाई को चारे में बदल देते हैं। एक दिन उन्होंने मेरे
Read Moreगधों पर दाँव लगाओगे तो रेस क्या जीतोगे,ऐसी चोट खाओगे कि चलना भी भूल जाओगे। झूठों के साथ रहोगे तो
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