उफ़ ये गर्मी
शोले बरसें गगन से,भट्ठी बनी जमीनमट्ठा, लस्सी, शीतरस, सत्तू हुए कुलीनसत्तू हुए कुलीन, गरम हो रही हवाएंखुद को पालनहार, समझने
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Read Moreधरती कराह रही है। नदियां सिकुड़ रही हैं। जंगल सिसक रहे हैं। पहाड़ टूट रहे हैं। हवा जहरीली हो रही है। मौसम का स्वभाव बदल चुका है। कभी असमय बारिश, कभी भीषण सूखा, कभी विनाशकारी बाढ़, कभी असहनीय गर्मी—प्रकृति मानो बार-बार मनुष्य को चेतावनी दे रही है कि यदि अब भी नहीं संभले, तो आने वाला समय केवल कठिन नहीं, बल्कि भयावह हो सकता है। आज “पर्यावरण संकट” कोई भविष्य की आशंका नहीं रह गया है, बल्कि वर्तमान की कठोर वास्तविकता बन चुका है। यह केवल वैज्ञानिकों या पर्यावरणविदों का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। क्योंकि यदि पर्यावरण सुरक्षित नहीं रहेगा, तो मानव सभ्यता का विकास, अर्थव्यवस्था, तकनीक, राजनीति और सामाजिक संरचनाएं—सब कुछ धीरे-धीरे अर्थहीन हो जाएगा। विडंबना यह है कि जिस मनुष्य ने प्रकृति की गोद में जन्म लिया, उसी ने सबसे अधिक प्रकृति का शोषण किया। विकास के नाम पर हमने जंगल काटे, नदियों को प्रदूषित किया, पहाड़ों को खोखला किया और धरती के संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया। हमने आधुनिकता को उपभोग से जोड़ दिया और सुविधा को सफलता का पर्याय बना दिया। आज शहरों में कंक्रीट के विशाल जंगल खड़े हो रहे हैं, लेकिन वास्तविक जंगल लगातार समाप्त हो रहे हैं। पेड़ों की जगह पार्किंग बन रही है। तालाबों की जगह इमारतें उग रही हैं। खेतों की जगह कॉलोनियां विकसित हो रही हैं। प्राकृतिक जीवनशैली की जगह कृत्रिम जीवन ने ले ली है। परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पर्यावरण असंतुलन का प्रभाव केवल प्रकृति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन पर पड़ता है। वायु प्रदूषण के कारण सांस संबंधी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। दूषित जल अनेक बीमारियों को जन्म दे रहा है। अत्यधिक गर्मी और लू से हजारों लोगों की जान जा रही है। खेती प्रभावित होने से खाद्य संकट और महंगाई बढ़ रही है। गांवों में जहां कभी तालाब, कुएं और हरियाली जीवन का आधार थे, वहां अब जल संकट गहराता जा रहा है। भूमिगत जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। नदियां या तो सूख रही हैं या प्रदूषण से दम तोड़ रही हैं। कई शहरों में पीने योग्य पानी सबसे बड़ी समस्या बन चुका है। आने वाले वर्षों में पानी को लेकर संघर्ष और गंभीर हो सकते हैं। पर्यावरण संकट का सबसे अधिक प्रभाव गरीब और मेहनतकश वर्ग पर पड़ता है। अमीर व्यक्ति एयर कंडीशनर और महंगे संसाधनों से कुछ हद तक स्वयं को बचा सकता है, लेकिन मजदूर, किसान, रिक्शाचालक, निर्माण कार्य करने वाले श्रमिक और खुले आसमान के नीचे काम करने वाले लोग भीषण गर्मी, प्रदूषण और जल संकट का सीधा सामना करते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की अवधारणा को नए दृष्टिकोण से देखें। केवल आर्थिक वृद्धि ही वास्तविक विकास नहीं हो सकती। यदि विकास प्रकृति को नष्ट करके हासिल किया जाए, तो वह अंततः विनाश ही साबित होगा। वास्तविक प्रगति वही है जिसमें पर्यावरण और मानव जीवन दोनों सुरक्षित रहें। भारत जैसे देश में पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं हो सकती। यह जनभागीदारी का विषय है। जब तक समाज स्वयं जागरूक नहीं होगा, तब तक केवल कानून और योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि पर्यावरण संरक्षण कोई अतिरिक्त कार्य नहीं, बल्कि जीवन रक्षा का अभियान है। हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना होगा। पानी की बर्बादी रोकनी होगी। प्लास्टिक के अत्यधिक उपयोग से बचना होगा। अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना होगा। सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना होगा। ऊर्जा की बचत करनी होगी। छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को केवल औपचारिक विषय बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। बच्चों को प्रकृति के महत्व से भावनात्मक रूप से जोड़ना होगा। उन्हें यह सिखाना होगा कि पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि जीवनदाता हैं। नदियां केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि सभ्यता की धड़कन हैं। सरकारों को भी पर्यावरण संरक्षण को विकास नीति के केंद्र में रखना होगा। हरित ऊर्जा, वर्षा जल संरक्षण, जैविक खेती, वन संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण को प्राथमिकता देनी होगी। केवल घोषणाओं और अभियानों से काम नहीं चलेगा, बल्कि कठोर और प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक होगा। औद्योगिक विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति को स्थायी क्षति पहुंचाए, वह अंततः समाज के लिए घातक बन जाता है। उद्योगों को पर्यावरणीय मानकों का कठोरता से पालन करना चाहिए। प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों और परियोजनाओं पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संबंधी मुद्दों को केवल एक दिन की खबर बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं। जलवायु परिवर्तन, जल संकट, प्रदूषण और वन विनाश जैसे विषयों पर लगातार राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए। जिस गंभीरता से राजनीति और मनोरंजन की चर्चा होती है, उसी गंभीरता से पर्यावरण संकट पर भी चर्चा आवश्यक है। धार्मिक और सामाजिक संगठनों को भी आगे आना होगा। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को पूजनीय माना गया है। नदियों को मां, वृक्षों को देवतुल्य और धरती को मातृस्वरूप कहा गया है। यदि इन सांस्कृतिक मूल्यों को व्यवहार में उतारा जाए, तो पर्यावरण संरक्षण जनआंदोलन बन सकता है। आज दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता बढ़ रही है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया, तो भविष्य में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक आपदाएं, खाद्य संकट और स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकते हैं। लेकिन केवल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और समझौतों से समाधान नहीं निकलेगा। समाधान तब निकलेगा जब हर देश, हर समाज और हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझेगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पृथ्वी केवल वर्तमान पीढ़ी की संपत्ति नहीं है। आने वाली पीढ़ियों का भी इस पर समान अधिकार है। यदि हम आज प्रकृति को नष्ट करेंगे, तो भविष्य की पीढ़ियों को संकट और अभाव विरासत में मिलेगा। वास्तव में पर्यावरण संरक्षण केवल पेड़ लगाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन के प्रति संवेदनशीलता का प्रश्न है। यह मानवता के अस्तित्व की रक्षा का संघर्ष है। यदि हवा विषैली हो जाएगी, पानी समाप्त हो जाएगा और धरती बंजर हो जाएगी, तो आधुनिक तकनीक और आर्थिक समृद्धि भी मानव जीवन को सुरक्षित नहीं रख पाएगी। आज आवश्यकता केवल भाषणों और नारों की नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन की है। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति पर विजय प्राप्त करना संभव नहीं है। मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा है। जब प्रकृति संतुलित रहती है, तभी जीवन सुरक्षित रहता है। यह समय चेतने का है। यदि अब भी हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। वे पूछेंगी कि जब नदियां मर रही थीं, जंगल कट रहे थे और धरती तप रही थी, तब हमने क्या किया?
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