गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

खुशनुमा जिंदगी नहीं आती, ग़र तेरी दोस्ती नहीं आती। गीत लिखता हूं शेर कहता हूं, मत कहो शायरी नहीं आती। मैं तरफदार हरदम सच का हूं, झूठ की पैरवी नहीं आती। मौत आती है रोज़ ही मुझ तक, इक मगर ज़िंदगी नहीं आती। चांद आता है संग में हरदम, तन्हा क्यूं चांदनी नहीं आती। सिर्फ […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मुझे न दौलत की जुस्तजू है न तख्त ओ ताज की आरजू है फकीर हूं मैं फकीर दिल है यूं फकीरी में साथ चल सकोगे। के सीखा है हमने मुस्कुराना मुझे न गम ना खुशी की परवाह मेरी जिंदगी है धूप छाया क्या ऐसे मौसम में ढल सकोगे। यूं दरबदर हम भटक रहे हैं न […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ये कुदरत का कहर है या किस्मत का असर है कोई दीवार न छत है लोग कहते हैं ये घर है । कोई बहार इस तरफ कभी नहीं आती बदल रहा है जहां मुफलिसी नहीं जाती जल रही है जिंदगी रेत सी तो जलने दो छत नहीं है मुझको बरसात का डर है। कितना मासूम […]

गीतिका/ग़ज़ल

बेटी है तो कल है

बेटे भले ही झूठे निकलें पर बेटी तो सत्य अटल है, बेटी का मान सदा ही रखना सब,बेटी है तो कल है। कोख में ना मारो, बेटी बिना जीवन नही सफल है, जीवन में उजियारा लाती है बेटी,बेटी है तो कल है। प्रियजन पे संकट आए,तो करती नयन सजल है, मन से और तन से […]

गीतिका/ग़ज़ल पद्य साहित्य

ग़ज़ल

ग़ज़ल दूर मुझसे बहुत खुशी है अभी रूठी रूठी सी ज़िन्दगी है अभी हर तरफ देख तीरगी है अभी बाँटना तुझको रौशनी है अभी जानलेवा वबा है कोरोना जी रहा डरके आदमी है अभी छोड़ तू शय बुरी सियासत है शर्म थोड़ी अगर बची है अभी मेरी इस जिंदगी में लगता है इक भले दोस्त […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

यूँ नहीं डरा करो। मस्त हो जिया करो। होश में रहा करो। नाप कर पिया करो। ज़ुल्म रोक दो ज़रा, ज़ालिमों हया करो। बेबसी जहाँ दिखे, जा वहाँ दया करो। अब कहीं छिड़क नमक, घाव मत हरा करो। — हमीद कानपुरी

गीतिका/ग़ज़ल

कोरे सपने देख विजय का जश्न मनाने वाले लोग

कोरे सपने देख विजय का जश्न मनाने वाले लोग पछताते हैं सच्चाई से आँख चुराने वाले लोग किस्मत से यदि मिल जाएं तो दिल में धड़कन से रखना मुश्किल से मिलते हैं सच्चा प्यार निभाने वाले लोग वक्त निकलने पर राहों में ख़ार बिछाने लगते हैं वक्त पड़े स्वागत में अपनी आँख बिछाने वाले लोग […]

गीतिका/ग़ज़ल

है युग का आदमी

नशे  का  सौदागर, है  युग का आदमी। छुपा  हुआ अजगर,है युग का आदमी। काम, क्रोध, लोभ, मोह, हंकार  पालता, हुआ बद से बदतर, है युग का आदमी। नेक   इंसान  से   भी   भरी   है  धरती, करता इन में बसर, है युग का आदमी। भक्ति की लहर में डूबा समाज देखिये, खो देता सब असर है युग […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

फिज़ा है फूल है रवानी है। तेरे बगैर सब बेइमानी है।। पसीना जिस्म से सूखा ही कब, क्या बुढ़ापा और क्या जवानी है‌‌।। कई तलवार और एक म्यान, उसकी आदत बहुत पुरानी है।। अश्क जारी रहे आवाज न हो, इश्क की बस यही निशानी है।। तूफानों आओ कि जलूं सूरज, दीप ने भी जिगर में […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

वो जो कुछ लोग राजदार रहे। काम जब भी पड़ा फरार रहे।। एक लम्हा खुशी का आया तो, जिंदगीभर के ग़म तैयार रहें।। जमाने की हवा लगी उसको, मशविरे सब मेरे बेकार रहे।। तेरी मर्ज़ी पे भला किसका हक, तूं जिसे चाहे वो हकदार रहे।। दीप तो एक ही रहा सूरज, मगर तूफान बेशुमार रहे।। […]