गीतिका/ग़ज़ल

विधाता की निगाह में

ये जिंदगी गुजर रही है आह में जाएगी एक दिन मौत की पनाह में। कर लो चाहे जितने पाप यहां हो हर पल विधाता की निगाह में। मेरी कमी मुझे गिनाने वाले सुन शामिल तो तू भी है हर गुनाह में। छल प्रपंच से भरे मिले हैं लोग दगाबाजी मुस्काती मिली गवाह में। खोने के […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर वक़्त बोझ से मन भारी। लगता मन भर का कन भारी। मन ही चालक है जीवन का, सँभले न रोग तो तन भारी। जब दाल झूठ की गले नहीं, लगता सच का तृन-तृन भारी। कायर तो पीठ दिखाते हैं, लगता उनको हर रन भारी। जब साँपों में विष नहीं भरा, उनको है अपना फन […]

गीतिका/ग़ज़ल

सत्य की जयकार होगी

सत्य की जयकार होगी ,झूठ की फिर हार होगी। हर चुनावों में सफल हो ,सत्य की सरकार होगी। झूठ के पिछलग्गुओं की ,अब धुनाई यार होगी । सत्य की अवधारणाएं ,हर जगह साकार होगी। सत्य की गोटी चलेगी ,झूठ की लाचार होगी। झूठ के हर जुल्म पर अब ,सत्य की तलवार होगी।—महेंद्र कुमार वर्मा

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बदले बदले से मिजाज हमारे हैं कह दिया तुमने हम तुम्हारे है । उनकी यादों में खोये रहते है, अब तो यादो के बस सहारे हैं। तेरी उल्फत में यूँ बदनाम हुए, हम पे इल्जाम लगे सारे हैं। दिल्लगी की खता हुई हमसे, सूने सूने से ये नजारें हैं फना हो गये वो किस्से अब, […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

अपना चेहरा न ग़मगीं बनाया करो। वक्त  कोई  भी  हो  मुस्कुराया करो। साथ चाहे न चलकर के जाया करो। रास्ता   ठीक  लेकिन  बताया  करो। इस तरफ भी कभी यार आया करो। सिर्फ मुझको नहीं  घर बुलाया करो। मत  सवालात  उन पर  उठाया करो। दोस्तों   को  नहीं   आज़माया  करो। हर शिकायत को हँसकर भुलाया करो। जब  […]

गीतिका/ग़ज़ल

क्या-क्या छुपाने लगे हो तुम

कितना मुश्किल है तन्हा जीना, बताने लगे हो तुम जिस तरह से हर घड़ी अब याद आने लगे हो तुम तुम्हें कहाँ याद आती होंगी अब मिट्टी  की खुशबू मेरे बेटे, क्या करें शहर में जो कमाने लगे हो तुम कैसे जी पाओगे इत्मीनान से , दो – चार  दिन भी क्यों ज़माने भर का […]

गीतिका/ग़ज़ल

दोहा गीतिका

“दोहा गीतिका” क्यों मानव से भी बड़ा, होता चला विकास कुछ सोएं मरुभूमि पर, कुछ का घर आकाश क्या गरीब खाता नहीं, पिचका उसका पेट कुछ क्यों होटल खेलते, बावन पता ताश।। बैंक व्याज देता नहीं, कर्ज है कमरतोड़ मध्यमवर्गी खिन्न है, क्या खाएं घर घास।। वोट बहुत है कीमती, सस्ता क्यों इंसान क्यों कुर्सी […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

इक जख्म सा सीने में था रात भर रिसता रहा जिंदगी की दौड़ में मैं ही सदा पिसता रहा आज जाकर ये लगा कुछ सोच लूँ अपने लिए हाथ में था अब तलक जो हाथ से गिरता रहा, हर कसौटी पर जमाने की खरा उतरा हूँ मैं क्योंकि अब तक सब लकीरें हाथ की घिसता […]

गीतिका/ग़ज़ल

बेटियों से पहचान हमारी

माता-पिता के जान से प्यारी, दादी-दादाजी के राज दुलारी। बड़े लाड से कहें चाची-चाचा, बेटियों से ही पहचान हमारी। जिस घर जन्म लेती हैं बेटियां, वहीं होता शहनाई की तैयारी। बड़े ही अभिमान से कहे भाई, बहन पुरायेगी अरमान हमारी। बेटियों से घर में होती है रौशनी, इन्हीं से तो बनती नई रिस्तेदारी। बड़े ही […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

इंतज़ार करने से भी सब हासिल नहीं होता जो दरिया है , वो  कभी  साहिल नहीं होता ज़िन्दगी भले  ही हो  रोज़ नज़्र-ए-मसाइल* खुदाया , ये  दिल कभी बोझिल नहीं होता वो मुझ तक आता  है और  गुज़र जाता है बसा है नैनों में, रूह में शामिल नहीं होता कैसे मानें कि बेहद कुछ अच्छा […]