नवीनतम लेख/रचना

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    चारों और अंधेरा देखा दूर  बहुत सवेरा देखा! मज़बूरों का फुटपाथों पे, मैने  रेन- बसेरा देखा! बिखरे सब परिवार मिले, तेरा  देखा,  मेरा देखा! ससंद  के  गलियारों में, मक्कारों का डेरा देखा! ऐरे-गेरे जितने भी मिले,...

  • जीवन की सहजवृत्तियाँ

    जीवन की सहजवृत्तियाँ

    अभी-अभी पौधे और घास सींचकर बरामदे के तखत पर मैं बैठा हूँ…जानता हूँ, इन्हें छोड़कर अब जाने वाला हूँ…लेकिन इन्हें कुम्हलाते…मुरझाते…नहीं देख सकता..एक अजीब सा लगाव हो आया है..इन पौधों और इस वातावरण से…!! खैर…यह भी...








  • काश ये आता समझ हर आदमी को…

    काश ये आता समझ हर आदमी को…

    काश ये आता समझ हर आदमी को रंजिशें देती नहीं खुशियाँ किसी को झूठ की हमदर्दियाँ डँसने लगी हैं नाग बनकर ज़िन्दगी की आजिजी को देखता है हर कोई मुस्कान लब की देखता है कौन आँखों...

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