नवीनतम लेख/रचना

  • गीतिका

    गीतिका

    जब से साथ लेखन प्रेमियों का पाया, बुद्धिजीवी, साहित्यकारो से सीख पाया रोज नये विषय नये विचार सा व्यबहार, मन लिखने को रहता बहुत उकसाया रचना का मापदंड सही रूप समझकर, तभी तो अपना समझ सही...

  • अस्तित्व

    अस्तित्व

    आँधियों के वेग से दिन रात भागना अपने प्रतिरूप अस्तित्व रिश्ते झाकना. कुछ से तनाव ले कुछ मन बना नाता यूँ ही जीवन लगा हर क्षण चला जाता. हाड़ -मास गात हूँ तूफानों में बढ़ना जानी...

  • “कता/मुक्तक”

    “कता/मुक्तक”

    दिल की बातें कभी-कभी होंठों पर भी आ जाती है। मुस्कुराहट मन में खिल कभी लबो पर छा जाती है। गुजरे वक्त की नजाकत कभी गम गुदगुदा जाए तो- तन्हाई घिरी हँसी लपक सुर्ख चेहरे को...

  • “लंगोटिया यार” देश विदेश, न जाने मेरे लंगोटिया यार (आज के दौर में कहें तो डायपरिया यार) मित्र हीरालाल यादव जी, अपनी बिना सीट वाली सायकल से लगभग बीस वर्षों से यात्रा कर रहें हैं। परिचय...

  • “भाम छंद”

    “भाम छंद”

    विधान~[ भगण मगण सगण सगण सगण] ( *211 222 112*, 112 112) 15 वर्ण, *यति 9-6 वर्णों पर*, 4 चरणदो-दो चरण समतुकांत] सात पहाड़ा धाम शिवे, शिव का पहरा। पाल रहे आकार हरी, शुभदा भँवरा।। जो...


  • प्रेम….

    प्रेम….

    सुनो ! समझो ना होने लगा है प्यार तुमसे गहराता जा रहा दिनों दिन हर एक लम्हा प्यार का रिश्ता नहीं रिश्ता नहीं एक रूहानी एहसास पास नहीं तुम मेरे फिरभी जी रही हूँ तुम्हारी यादों...


  • तेरे रूह की पैरहन

    तेरे रूह की पैरहन

    मेरी रूह     तेरे रूह की पैरहन में लिपटे खामोश फ़िज़ा में कुछ इस तरह सिमटे दिल की ख़िलाफ़त एक-एक लम्हें की अदायगी तेरे यादों की सिलवटें मुझमें मुझी को करें जुदा धड़कनों की आहटें...

  • चले आओ कि तेरे बिन

    चले आओ कि तेरे बिन

    चले आओ कि तेरे बिन कहीं अच्छा नहीं लगता | कि सपने देखती तो हूँ मगर सच्चा नहीं लगता | बहुत कोशिश किया मैनें कि रह लूँ मैं तुम्हारे बिन , मगर तुम बिन मुझे जीना...

राजनीति

कविता