गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सामने आके मेरे खड़ा है तो क्या, एक बेकार ज़िद पे अडा है तो क्या‌। देखलो मुझको मैं भी हूं छोटा नहीं, वो अगर थोड़ा मुझसे बड़ा है तो क्या। झूठ फिर भी नहीं वो कहेगा कभी, आइना लाख हीरों जड़ा है तो क्या। अंत में कट के गिरना ही किस्मत तेरी, तू पतंगों सा […]

गीतिका/ग़ज़ल

नया दौर

नये दौर के इस युग में, सब कुछ उल्टा पुल्टा है, महँगी रोटी सस्ता मानव, गली गली में बिकता है। कहीं पिंघलते हिम पर्वत, हिम युग का अंत बताते हैं, सूरज की गर्मी भी बढ़ती, अंत जहां का दिखता है। अबला भी अब बनी है सबला, अंग प्रदर्शन खेल में, नैतिकता का अंत हुआ है, […]

कविता

कविता

छूट जाते हैं समय की आंधी में कुछ सम्बन्धों से साथ पर जो नहीं छूट पाता वो है उसमें निहित मोह मन अकारण ही उसे याद करता और मौजूदा वक्त पराया सा लगने लगता मन अशान्त खोया-खोया सा रहता उसकी कमी वक्त के हर लम्हें में खालीपन भर देता कोई अर्थ नहीं उन सम्बन्धों के […]

कविता

कविता

वो वादे याद है न तुम्हें जिसके पूरे होने के इंतजार में समय का एक-एक लम्हा कितनी बेताबी से जिया है मैनें तुमसे मिलन की उम्मीदों को दिल के आईने में सजाकर किया श्रृंगार प्रेम के चटक रंगों से तन के पोर-पोर में समाई तेरे एहसासों की छोटी सी छोटी आहट नहीं था कोई बस […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हौसला हो पास जिसके, पंख की जरुरत नही, प्रीत का विश्वास संग हो, साथ की जरुरत नही| आस्था ने सदा जिसे, जीने का संबल दिया हो, हर दिवस खुशियाँ मिलें, मधुमास की जरुरत नही| दिल मिले न कभी, ख्याल भी हों जुदा जुदा, साथ फिर भी चल रहे, अलगाव की जरुरत नही| एक हो मंजिल […]

गीतिका/ग़ज़ल

संभलना सिखा दिया

दुनिया की ठोकरों ने संभलना सिखा दिया, झूठ और फरेब को समझना सिखा दिया। बदल गया नजरिया लोगों को देखने का, आंखों से पर्दा उठा और सच दिखा गया। चेहरों के जंगल में खो गया था चेहरा मेरा, खोई हुई पहचान ने मशहूर होना सिखा दिया। गिर गिर कर उठने ने हौसला बढ़ा दिया, मुश्किलों […]

कविता

रात चाँदनी गहरी-गहरी

रात  चाँदनी  गहरी-गहरी प्रेम-प्रीत क्यू ठहरी-ठहरी ॥ चलो आज चाँदनी छू लें हम कुछ मन की चाही कर लें हम i जीवन नैया कब रुकी-रुकी ग़म की नदियाँ गहरी-गहरी ॥ हम-तुम जाने फ़िर हों  ना हों ये मधुर-मिलने फ़िर हो ना हो ! दुनियाँ क्यों है ठहरी-ठहरी क्यों नज़रें हैं प्रहरी-प्रहरी ॥ चलो आज बाँध […]

गीत/नवगीत

गीत

कट रहें हैं पेड़ देखो, ताल में घर बन रहे हैं , बन रहे हैं कंकरीटों के शहर, अब गाँव सारे, ऐ प्रवासी पक्षियों अब तुम न आना ! जहर पीती हर नदी,और झील के सिमटे किनारे। अब कहाँ चकवी निशा में,मीत को अपने पुकारे ? कहाँ कोई क्रौंच विरहा में अकेला मर मिटेगा ? […]

कविता

यादों के झरोखे से-13

मैं पतंग बन जाऊं मेरा मन है कि मैं पतंग बन जाऊं मकर संक्रान्ति और पतंगोत्सव की पावन वेला पर सूर्यदेवता की साक्षी में पतंग की तरह नील गगन की नीलिमा में लहराऊं मैं पतंग बनूं शांति की सौहार्द की सद्भाव की इंसानियत की प्रेम की निर्मल आनंद की परोपकार की अतिथि के सत्कार की […]

कविता

तुम साथ थे जब

गम भी खुशियां दे जाते थे, जब हम साथ तुम्हारा पाते थे। प्रीत के बंधन में बंध कर , सपनों की दुनिया में खो जाते थे। खुशियों की महफिल सजती थी, दुख के आलम गुम जाते थे। साथ तुम्हारा पाकर हम, सारी दुनिया को भूल जाते थे। सांसों में आज भी बसते हैं, तुमसे हसीन […]