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कविता
*सुधीर श्रीवास्तव 25/06/202625/06/2026 0 Comments कविता

यमराज की राम जी को सलाह

आज रात प्रभु श्रीराम जी अभी अपने शयनकक्ष में पहुँचे ही थे कि पीछे से यमराज भी पहुँच गए, उन्हें

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कविता
गरिमा लखनवी 25/06/202625/06/2026 0 Comments

मानवीय संवेदनाएँ

मानवीय संवेदनाएँ शून्य हो गई हैं,कुछ लोग सबकी ज़िंदगी से खेल रहे हैं।क्या पैसा इतना ज़रूरी हो गया है,कि इंसानियत

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सामाजिक
*किशन भावनानी 25/06/202625/06/2026 0 Comments

वाणी का विज्ञान

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय। संत कबीर का यह दोहा केवल

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कविता
*चंचल जैन 24/06/202624/06/2026 0 Comments

ये हम कहां जा रहे है….

ये हम कहां जा रहे है? संवेदनाहीन, भावशून्य,  पिशाच वृत्ति से लिपट, मानव जीवन की अस्थियां ले, संस्कारों की धज्जियां

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शिक्षा एवं व्यवसाय
डॉ. शैलेश शुक्ला 24/06/202624/06/2026 0 Comments

पारंपरिक शिक्षा युवाओं का भविष्य बर्बाद कर रही है

भारत को युवा शक्ति का देश कहा जाता है और यह माना जाता है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य

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गीत/नवगीत
पंकज नैथानी 24/06/202624/06/2026 0 Comments

सांख्यिकी पर मार्क से सीधा संवाद

मार्क, सच मानो, मैं तुमसे ज़रा भी इत्तेफाक नहीं रखता,सांख्यिकी ज्ञान, सफेद झूठ के परे, दर्ज हो नहीं सकता॥ जन्म

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कविता
संजय एम. तराणेकर 24/06/202624/06/2026 0 Comments

कम में खुश रहिए

कम में खुश रहिए, खुशी कम नहीं होगी,मन की यह दौलत कभी कम नहीं होगी।महलों की चमक से जीवन नहीं

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कविता
डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 24/06/202624/06/2026 0 Comments

ग्रामीण शाम के दृश्य पर एक कविता

ढलती शाम का सफ़रसांझ ढली है, सूरज लाल,पेड़ों के पीछे छुपा गुलाल।कच्ची सड़क पर उड़ती धूल,घर लौट रहे हैं सब

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राजनीति
अजय कुमार, लखनऊ 24/06/202624/06/2026 0 Comments

हादसों का मंज़र, व्यवस्था की लापरवाही  

आचार्य चाणक्य ने सदियों पहले एक शाश्वत सत्य कहा था कि बुद्धिमान शासक वही है जो आने वाले संकट को

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कविता
राजेन्द्र लाहिरी 24/06/202624/06/2026 0 Comments

मैं नहीं मासूम या भोला

मत कह मुझे सीधासाधा, भोला या मासूम,वक्त पड़े तो दिखा सकता हूँअपना अनदेखा रौद्र रूप। कर लो जितनी मनमानियाँ करनी

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सम्पादक : डाॅ विजय कुमार सिंघल

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