ग़ज़ल
ये दीवारों के साए रोज़ जो डसते हैं आँखों को,चराग़ों की तरह हम ख़ौफ़ से डर क्यों नहीं जाते? बिक़ी
Read Moreथाली में पकवान सजे हैं, आँखें टीवी पर अटकी,निवाला मुँह तक आता है, सुध-बुध कहीं भटकी।कभी समाचार-धारावाहिक, मूवी का शोर
Read Moreमैंने आज एक बात पर बड़ी गंभीरता से विचार किया कि लोग जैसा खुद को मेरे सामने प्रस्तुत करते हैं
Read Moreजिस थाने में सुरक्षा की उम्मीद ले आई,वहीं इंसानियत शर्मसार करने हो आई।जिस वर्दी पर विश्वास जताया था उसने,उसी ‘वर्दी’
Read Moreवक्त की धूप-छांव और पगडंडियों से गुजरते हुए ज़िंदगी कब एक ऐसे मोड़ पर आ पहुँचती है, जहाँ सिवाय अहसासों
Read Moreहमारा भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी लगभग 65 प्रतिशत आबादी आज भी गांवों में निवास करती है।
Read Moreआगे पीछे खड़ी है यहाँ मौत ।बारूद बन गई जीवन की सौत ॥कहाँ पे ले जा रहा है ये जमाना
Read Moreदिल्ली का रामलीला मैदान भारतीय राजनीतिक इतिहास का वह मूक साक्षी रहा है, जिसने सत्ता के अहंकार को भी कई
Read Moreसमय बड़ी जल्दीउम्रदराज़ हो जाता है।भोर में वह किसी नवजातस्वप्न की तरह आँखें खोलता हैकोमल, कमसिन,ओस मेंभीगी कच्ची कली-सा। फिर
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