लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 30)
अयोध्या के बाहर नन्दीग्राम में रहकर भरत जी बड़े परिश्रम और मनोयोग से राजकार्य चला रहे थे। उनके राज्य में
Read Moreअयोध्या के बाहर नन्दीग्राम में रहकर भरत जी बड़े परिश्रम और मनोयोग से राजकार्य चला रहे थे। उनके राज्य में
Read Moreसड़क पर धूप तप रही थी। पांवों के नीचे तपती मिट्टी, कंधों पर बोझ से भरे थैले और आँखों में
Read Moreएक छोटा-सा संदूक पीतल का, पर चमकता सोने-सा।नानाजी-नानीजी ने माँ को दिया थाउनकी शादी के समय आशीष, परंपरा और अपनापन
Read Moreप्रातः उठकर सभी अपने नित्य कर्म करके चलने को तैयार हुए। पहले उन्होंने यमुना नदी पार की, जिसमें बहुत समय
Read Moreचुनावी दौर था ।धन्नु को नेताजी के फोन आते । नेताजी धन्नु को धनपत कहकर संबोधित करते उसके परिवार का
Read Moreजुलाई का महीना था दिन के लगभग बारह बजे होंगे। आज मौसम साफ था इसलिए बड़ी तेज धूप थी। वरना
Read Moreभरत जी द्वारा श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में चौदह वर्षों तक अयोध्या का शासन सँभालना स्वीकार करने के
Read Moreनिर्बल को न सताइए,जाकी मोटी हाय, बिना जीव की श्वास से,लौह भस्म हो जाए। संत कबीर दास के इस दोहे
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