ढलती शाम
” बाबुजी अब तक नहीं लौटे।” शिखा कब से बाबुजी की बांट जोह रही थी। “शेखर, रोज टहल कर समय
Read Moreप्रिय अमन, मेरी आँखों के तारे, नूर‑चश्म,बेटा, तुम बचपन में मेरे कंधे पर सिर रखकर ज़िद किया करते थे, कभी
Read Moreकमली बैठे-बैठे जलते तवे को घूर रही थी । शराबी पति की हाड़ तोड़ती मार खाकर रोटी बनाने का किसका
Read Moreगाँव के आख़िरी छोर पर मिट्टी की दीवारों वाला एक घर था,उसी में रहता था हरिहर तीन बीघा बंजर-सी ज़मीन,
Read Moreहर शाम पार्क में लोग उसे उसी बेंच पर देखते थे। दाईं ओर एक कुर्सी हमेशा खाली रहती। न कोई
Read Moreदेवकुँवर तीस साल की उम्र में माँ बनी थी। हीरा जैसा हीरा लाल बेटा मिला था। फिर ईश्वर की ऐसी
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