विंडो सीट (पार्ट -2) : जो कहा नहीं गया — समीर की जुबानी
विंडो सीट पार्ट -१ : वर्षों बाद एक रेलयात्रा में सुरभि और समीर आमने-सामने आते हैं। कभी एक-दूसरे से गहरे जुड़े
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Read More“By the way, I’m kashish “, वह लड़की मुस्कुरा कर बोली। और मैं… इससे पहले कि विपुल खुद अपना नाम
Read Moreगर्मियों की छुट्टियों के समय कन्फर्म सीट मिलना कोई आसान बात न थी । भतीजी की सगाई एकदम से तय
Read More“लो भागवान ! आ गए ट्रांसफर के आर्डर। चलो अब दिल्ली चलने की तैयारी कर लो।” सुमि के पिता जी
Read Moreनंदिता रोज अपनी लिखी एक कविता फेसबुक पर पोस्ट करती। सुबह फ्रेश होने के बाद चाय पीकर कविता लिखने बैठ
Read Moreरीता जी एक बैंक में कैशियर के पद पर कार्यरत हैं। पतिदेव एक मल्टीनेशन कंपनी में जनरल मैनेजर है ।
Read Moreमैं उसकी जादूगरी में गिरफ़्तार होता चला गया , उस से मेरी मुलाक़ात कोई ज़्यादा पुरानी न थी , और
Read Moreरक्षाबंधन की सुबह थी। मुंबई के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहने वाली श्रद्धा की आँखें अलार्म के तीसरी बार
Read Moreअहमदाबाद की बारिश जैसे शहर को नहीं, रागिनी के भीतर के सूनेपन को भिगो रही थी। खिड़की के बाहर रुक-रुक
Read Moreकभी-कभी ज़िंदगी के सबसे बड़े सबक किसी स्कूल या किताब से नहीं, बल्कि एक साधारण से घर में, एक सादी-सी
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