मुक्तक
दौड़ा भागी करती रहती थकती कब है दीवानी।चलती रहती व्यवधानों संग रुकती कब है दीवानी।संग हवा का मिल जाए तो
Read Moreकला जन्म से थी हुईं, जीवन की मुस्कान।कनक प्रभा हो पथ चली, शासन माता जान।। सूरजमल जिनके पिता, छोटी बाई
Read Moreवेदों की चर्चा बहुत, मंचों पर दिन-रात।भूखे की पीड़ा पढ़ो, समझो हुआ प्रभात॥ ग्रंथों से ऊँची हुई, भाषण की हर
Read Moreभारत के गणतंत्र की, ये कैसी है शान।भूखे को रोटी नहीं, बेघर को पहचान॥ सब धर्मों के मान की, बात
Read Moreबात एक ही यूँ सदा, कहता है गणतंत्र।बने रहे वो मूल्य सब, जन- मन हो स्वतंत्र। संसद में मचता गदर,
Read Moreरोटी के ही वास्ते होरी छोड़ें गांवतब भी अभाव में धंसे उसके अपने पांव कैसा रमेश शहर है पूछे ना
Read Moreजाने कितनी पीठ बन गयी, कितने मठ उपजाये,हर मठ में शंकराचार्य, बड़े जतन बन कर धाये।लोभ मोह अहंकार, गाड़ी घोड़ा
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