विश्व हास्य दिवस ०३ मई – उन्मुक्त हॅसी
रोज मर्रा की इस भाग दौड़ मेंबनावटी पन के इस विकट दौर मेंज़िन्दगी तू किस मोड़ पर आ फंसीकहां खो
Read Moreरोज मर्रा की इस भाग दौड़ मेंबनावटी पन के इस विकट दौर मेंज़िन्दगी तू किस मोड़ पर आ फंसीकहां खो
Read Moreमंच हुए साहित्य के, गठजोड़ी सरकार,सभी बाँटकर ले रहे, पुरस्कार हर बार॥ कला नहीं अब माप है, संबंधों का जाल,योग्यता
Read Moreजबलपुर की लहर में, भरी समंदर पीर,ममता का वह रूप था, ईश्वर की तस्वीर॥ क्रुज की उस चीख में, गूँजी
Read Moreजर्जर कश्ती हो गई, अंधे खेवनहार,खतरे में ‘सौरभ’ दिखे, जाना सागर पार॥ लहरों का प्रहार है, उठता बारंबार,डगमग करती नाव
Read Moreयोगी भोगी हो गए, संत चले बाजार।अबलाएँ मठ-लोक से, रह-रह करें पुकार॥ माटी की मर्याद भी, हुई आज बेहाल,धर्म-ध्वजा के
Read Moreअपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल।बूढ़ा पीपल है कहाँ, गई कहाँ चौपाल॥ माटी की सोंधी महक, अब लगती
Read Moreस्याही, कलम, दवात से, सजने थे जो हाथ।कूड़ा-करकट बीनते, नाप रहे फुटपाथ।। जिन आँखों में स्वप्न थे, पढ़ने के अरमान।धूल
Read Moreमूक हुई किलकारियाँ, गुम बच्चों की रेल।गूगल में अब खो गये, बचपन के सब खेल॥ आँगन सूना हो गया, चुप
Read Moreदो प्रेम के मीठे से बोल डाल दे थके बदन में जान,ये मजदूर चाहता है तुमसे बस थोड़ा सा सम्मान
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