कविता – जब तुम उतरते हो
जब तुम उतरते होमेरे भीतर,उतर आता है आकाशउतर आती है धरतीऔरबिखर जाता है – इंद्रधनुष।महकने लगता है मुझमें –फागुन।तब मैं
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Read Moreपलकों पर नमी है,पर होंठों पर हंसी भारी है,देख ऐ ज़िन्दगी,मेरी मुस्कुराने की कोशिश जारी है,भीतर एक समंदर ग़म का
Read Moreजिसने भजन-सिमरन में मन लगाया,उसने जीवन का धन सच्चा पाया,मानव सेवा में सुख जिसने बाँटा,उसने हर पल ईश्वर को मुस्कुराया।
Read Moreजीवन की सार्थकता पहचान,स्वयं को यूँ न व्यर्थ गँवाएँ,लक्ष्य बनाकर मन में अपने,हर दिन आगे कदम बढ़ाएँ,राह कठिन हो,धूप कड़ी
Read Moreमैं हूं ही इंकलाब तो इंकलाब बनने दे,देख लेना मेरे दिल के दाग कभी और,देखो अगन उदर की अभी उसे
Read Moreमेरी कविता में जनता की आवाज होती है,मेरी कविता में नारी शक्ति की बात होती है,मेरी कविता में जल ,जंगल
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