बंजारों की लड़की
पहाड़ों की ओट से जब सूरज की पहली किरन निकलती, तो वादी-ए-चिनार सुर्ख़ सुनहरी रोशनी में नहा जाती। इसी वादी
Read Moreपहाड़ों की ओट से जब सूरज की पहली किरन निकलती, तो वादी-ए-चिनार सुर्ख़ सुनहरी रोशनी में नहा जाती। इसी वादी
Read Moreस्टेशन उस शाम असामान्य रूप से भरा हुआ था। बरसात अभी-अभी थमी थी और प्लेटफ़ॉर्म की भीगी ज़मीन पर भागते
Read Moreवह चौबीस साल की उम्र का अलबेलापन था, जब जिंदगी सिर्फ स्कूल के ब्लैक बोर्ड, चाक की धूल और चंद
Read More“विनीता जी, आपके पिताजी दुर्घटनाग्रस्त होकर हमारे अस्पताल में भर्ती हैं, आप जल्दी आइए.” सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ने फोन
Read Moreपैसा…पैसा….हर पल केवल व्यापार की चिंता। न समय पर सोना, न खाना। घर परिवार में सारे ऐषो आराम का इंतजाम
Read Moreशाम के साए ज़रा गहरे हो चुके थे। रेलवे स्टेशन के मुसाफ़िरख़ाने में बत्तियों की मद्धम रोशनी फैली हुई थी।
Read Moreआज बहुत दिनों बाद मिस्टर शर्मा पार्क पर दिखाई दिये। वे मेरे पास आकर मुझ से हाथ मिलाने लगे तो
Read Moreकमली बैठे-बैठे जलते तवे को घूर रही थी । शराबी पति की हाड़ तोड़ती मार खाकर रोटी बनाने का किसका
Read Moreसालों बीत गए। शहर के उस मशहूर बीएड कॉलेज की वो चहल-पहल, वो नई उम्र, नए अहसास और आंखों में
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