लघुकथा – दलाली चलती रहेगी
जिले में एक ईमानदार अफसर की नियुक्ति हो गयी। बिना घूस लिये काम करता। दलाली एक रूपये की नहीं। बड़ा
Read Moreजिले में एक ईमानदार अफसर की नियुक्ति हो गयी। बिना घूस लिये काम करता। दलाली एक रूपये की नहीं। बड़ा
Read Moreपुराना घर था… मिट्टी की वही सौंधी महक, आँगन में खड़ा नीम का पेड़, और बरसों से साथ निभाती दीवारें।
Read Moreउससे मेरी मुलाक़ात कोई बहुत पुरानी न थी, और न ही उसे मुकम्मल तौर पर ‘नई’ कहा जा सकता था।
Read More”वो चेहरा… महज़ एक चेहरा नहीं था, बल्कि मेरे दिल की पूरी ज़मीन का मरकज़ , यानी केंद्र बन गया
Read Moreछत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में मालती अपने बीमार बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। पास में खड़ी
Read Moreवो मेरे पिता के दोस्त थे, बहुत बड़े किसान और साहूकार। उनका नाम सुखदेव सिंह था। बहुत ही बड़ी हवेली।
Read Moreमैं लिखता हूँ। बहुत बड़ा लिखक्कड़ नहीं हूँ। आम जनता का लेखक हूँ। उनके बातें होती हैं। उनका दर्द, उनकी
Read Moreपति -पत्नी दोनों ही एक दूसरे के लिए चिंतित रहते थे । पता नहीं, पहले पहल आखिरी सांस कौन ले
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