ढलती शाम
” बाबुजी अब तक नहीं लौटे।” शिखा कब से बाबुजी की बांट जोह रही थी। “शेखर, रोज टहल कर समय
Read Moreपहाड़ों में जीने के लिए पहाड़ होना पड़ता है। जिस तरह पहाड़ धूप- छांव को सहते हुए हमेशा अपनी पीठ
Read Moreप्रिय अमन, मेरी आँखों के तारे, नूर‑चश्म,बेटा, तुम बचपन में मेरे कंधे पर सिर रखकर ज़िद किया करते थे, कभी
Read More14 सितंबर यानी हिंदी दिवस आने ही वाला था । हर जगह विद्यालयों, संस्थानों में इसकी तैयारी जोर-शोर से चल
Read Moreकमली बैठे-बैठे जलते तवे को घूर रही थी । शराबी पति की हाड़ तोड़ती मार खाकर रोटी बनाने का किसका
Read Moreगाँव के आख़िरी छोर पर मिट्टी की दीवारों वाला एक घर था,उसी में रहता था हरिहर तीन बीघा बंजर-सी ज़मीन,
Read Moreहर शाम पार्क में लोग उसे उसी बेंच पर देखते थे। दाईं ओर एक कुर्सी हमेशा खाली रहती। न कोई
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