लघुकथा – अमलतास की छांव
गर्मी अपने चरम पर थी। धूप मानो धरती को तपाकर उसकी सहनशक्ति को परख रही थी। सड़कें सन्नाटे में डूबी
Read Moreगर्मी अपने चरम पर थी। धूप मानो धरती को तपाकर उसकी सहनशक्ति को परख रही थी। सड़कें सन्नाटे में डूबी
Read Moreहमारी स्मृतियों की नदी जब बहती है, तो वह केवल शब्दों को नहीं, बल्कि एक पूरे कालखंड को जीवंत कर
Read Moreजिले में एक ईमानदार अफसर की नियुक्ति हो गयी। बिना घूस लिये काम करता। दलाली एक रूपये की नहीं। बड़ा
Read Moreपुराना घर था… मिट्टी की वही सौंधी महक, आँगन में खड़ा नीम का पेड़, और बरसों से साथ निभाती दीवारें।
Read Moreउससे मेरी मुलाक़ात कोई बहुत पुरानी न थी, और न ही उसे मुकम्मल तौर पर ‘नई’ कहा जा सकता था।
Read More”वो चेहरा… महज़ एक चेहरा नहीं था, बल्कि मेरे दिल की पूरी ज़मीन का मरकज़ , यानी केंद्र बन गया
Read Moreछत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में मालती अपने बीमार बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। पास में खड़ी
Read More