कहानी – खामोश हो गयी ठहाका
रात के दस बजे थे। एक आलीशान रेस्टोरेंट में डोसा खाने का आर्डर दिया। जब साथ होती थी दिव्या। एक
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Read Moreबचपन से ही आर्थिक धूप- छांव में पली नमिता । रोजमर्रा की जरूरते तो जरूर पूरा हो जाता लेकिन कभी
Read Moreविकास ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उसे सब कुछ छोड़कर भागना पड़ेगा। दुबई की चमचमाती इमारतों के
Read Moreबरसों बीत गए थे, यादों की धूल ने उन रास्तों को धुंधला कर दिया था जिन पर हम कभी साथ
Read Moreजिस दिन बाबा इस ‘रोज़-ए-फ़ानी’ से विदा हुए, उस दिन आसमान पर घटाएं नहीं थीं, मगर घर के अंदर एक
Read Moreशहला की ज़िंदगी उस सूखी झील की मानिंद हो गई थी जिसके वीरान किनारों पर अब परिंदे भी चहकना भूल
Read Moreयह दास्तान उस दौर की है जब रियासतों के सूरज ढल रहे थे, लेकिन खानदानी रसूख की तपिश अब भी
Read Moreशहर की सबसे व्यस्त चौराहे के सिग्नल पर बारह साल के राजू के हाथ में कोई खिलौना नहीं, बल्कि एक
Read Moreशहर के शोर से दूर उस पुरानी हवेली की दीवारों पर जमी काई अब सिसकियाँ लेती थी। वह हवेली, जिसे
Read Moreखंडवा कॉलेज की सर्द शामों की यादेंखंडवा के उस पुराने कॉलेज परिसर की सर्द शामें आज भी मेरे दिमाग़ के
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