कहानी – हम साथ-साथ है
पति की मृत्यु के बाद शिला ने कारोबार का सारा बोझ अपने सिर ले लिया। आखिर करती भी क्या, पेट
Read Moreपति की मृत्यु के बाद शिला ने कारोबार का सारा बोझ अपने सिर ले लिया। आखिर करती भी क्या, पेट
Read Moreमैं उस दिन स्कूल में बतौर परीक्षक-इम्तिहान मौजूद था। स्कूल के हॉल में ख़ामोशी का राज़ था, सिर्फ़ क़लम के
Read Moreमैं अपने बीमार और वृद्ध पिता को काशी के मुक्ति भवन ले जा रहा था। मन में एक ही उम्मीद
Read Moreऐसा पहली बार हुआ था कि नंदिनी घर से बाहर निकली और आदतन पलटकर पीछे देखा, पर उसे विदा करने
Read Moreगांव के बाहरी छोर पर बने उस पुराने घर में कभी बहुत रौनक हुआ करती थी। घर के आंगन में
Read Moreबुज़ुर्ग असलम साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी का एक-एक तिनका जोड़कर अपने इकलौते बेटे, फ़रहान, को इस क़ाबिल बनाया था
Read Moreशहर की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, ऊंची इमारतें और मसनूई रोशनियां कभी कभार इंसान को अंदर से बिल्कुल ख़ाली कर देती
Read Moreउस बड़े से पुश्तैनी ज़मीन की में अगर किसी का पसीना और त्याग छुपा था, तो वह सिर्फ़ बड़ा भाई
Read Moreपहाड़ों की ओट से जब सूरज की पहली किरन निकलती, तो वादी-ए-चिनार सुर्ख़ सुनहरी रोशनी में नहा जाती। इसी वादी
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