कहानी

कहानी

मैं अपनी ख़ुशी की खातिर इन ज़िम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकती

कश्मीर की वादियों में उस सुबह झेलम की धारा कलकल करती बह रही थी। डल झील पर हल्की धुंध तैर

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कहानी

डूबते सूरज की लाली में उनकी ज़िंदगी का नया सफ़र चमक रहा था

लाइब्रेरी की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से दोपहर की सुनहरी धूप लंबी लकीरों की तरह अंदर उतरकर किताबों पर बिखर रही थी।

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