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जय विजय

साहित्यिक एवं सामाजिक मासिक ई-पत्रिका

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सामाजिक
*किशन भावनानी 14/06/202614/06/2026 0 Comments

गृहिणियाँ हैं राष्ट्र निर्माता

वैश्विक स्तरपर भारतीय समाज में सदियों से गृहिणी को परिवार की धुरी माना जाता रहा है,किंतु विडंबना यह है कि

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कविता
संजय एम. तराणेकर 14/06/202614/06/2026 0 Comments

अनजान शहर में

अनजान ‘शहर’ की गलियों में,मैं खुद को ढूँढता फिर रहा हूँ।हरेक चेहरा लगता अपना-सा,फिर भी ‘तन्हा-तन्हा’ रहता हूँ। यहाँ पर

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कविता
गरिमा लखनवी 14/06/202614/06/2026 0 Comments

फूल

फूल ने मुस्कुराते हुए कहा,मैं काँटों के साथ रहता हूँ,मेरा जीवन बहुत कठिन है,फिर भी खुशबू बिखेरता हूँ।तब मैंने हँसकर

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कहानी
डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 14/06/202614/06/2026 0 Comments

मोहब्बत रूठ जाए, तो ज़िंदगी के सारे रंग उड़ जाते हैं 

यह कहानी किसी एक शख़्स की नहीं, बल्कि हर उस दिल की है जिसने मोहब्बत में सिर्फ़ पाना नहीं, बल्कि

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सामाजिक
रूपेश कुमार 14/06/202614/06/2026 0 Comments

युवाओं की आँखों में भविष्य, व्यवस्था के सामने चुनौती

भारत को युवाओं का देश कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि युवा ही किसी राष्ट्र की सबसे

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सामाजिक
*किशन भावनानी 14/06/202614/06/2026 0 Comments

ईश्वर का धन्यवाद करें

मानव जीवन रूपी गाड़ी के सुख़ और दुख, ख़ुशी और गम रुपी दो ऐसे पहिए हैं जिसके बगैर जीवन रूपी

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सामाजिक
*डॉ. प्रियंका सौरभ 14/06/202614/06/2026 0 Comments

महंगाई का बढ़ता साया

भारत जैसे विशाल और विकासशील देश में महंगाई केवल एक आर्थिक शब्द नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के दैनिक जीवन से

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लघुकथा
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा 14/06/202614/06/2026 0 Comments

समुद्र हूॅं

खेती -किसानी के साथ-साथ साहित्य सृजन का कार्य वह कड़ी मेहनत व दिल लगाकर करता था । बाहर कम ही

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कविता
*सविता सिंह 'मीरा' 14/06/202614/06/2026 0 Comments

संसार से भागे फिरते हो

क्यों मन मलिन उदास सखे,याद किसी की आई है?बैठे हो सरि के कूल परदखे किसकी परछाई है? क्यों चौंक मुड़े

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राजनीति
अवनीश कुमार गुप्ता 14/06/202614/06/2026 0 Comments

पूर्ण न्याय और संवैधानिक संतुलन

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि उसने राज्य की शक्ति को केवल शासन चलाने

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सम्पादक : डाॅ विजय कुमार सिंघल

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