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जय विजय

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सामाजिक
डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 15/05/202615/05/2026

विकसित भारत के निर्माण में हमारी भूमिका

किसी भी राष्ट्र की नियति केवल उसकी सीमाओं या सरकारी नीतियों से तय नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों के सामूहिक

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हाइकु/सेदोका
डॉ. अशोक कुमार शर्मा 14/05/202614/05/2026

इतना टूटा हूं कि

इतना टूटा हूं किशब्द भी साथ छोड़ देते हैंखामोशी बोलने लगती है रास्ते धुंधले से हैंकदम पहचान खो बैठे हैंपर

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शिक्षा एवं व्यवसाय
*डॉ. प्रियंका सौरभ 14/05/202614/05/2026

अंकों की अंधी दौड़ और खोता बचपन

“अंकों की इस दौड़ में, बचपन हुआ उदास।कंधों पर उम्मीद का, भारी पड़ा लिबास॥” भारत जैसे विकासशील देश में शिक्षा

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राजनीति
अजय कुमार, लखनऊ 14/05/202614/05/2026

दिल्ली दरबार पर भारी पड़ा जमीनी नेता

केरल की राजनीति में इस बार सिर्फ सरकार नहीं बदली, कांग्रेस की अंदरूनी ताकत का नक्शा भी बदल गया। दस

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संस्मरण
*सविता सिंह 'मीरा' 14/05/202614/05/2026

सिग्नल खुलने से पहले

बचपन की कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि और अधिक चमकने लगती हैं। वे याद आते ही

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कविता
पी. रवींद्रनाथ 14/05/202614/05/2026

सत्य के आलोक में

मन में कई इच्छाऍंबुद-बुद होती रहती हैं,अगर उस ओर ध्यान दें तोहम अपना रास्ता भूल जाते हैं। चित्त की सहज

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गीतिका/ग़ज़ल
*डॉ. डी एम मिश्र 14/05/202614/05/2026

ग़ज़ल

बोलने से लोग घबराने लगेसोचकर नुक़सान डर जाने लगे पीठ पीछे खूब दम भरते रहेसामने आने से कतराने लगे कल

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कविता
*चंचल जैन 14/05/202614/05/2026

नारायणी

नारी हूँ मैं, नर की नारायणी। बेटी, भगिनी, प्रिया, माँ कल्याणी।। सक्षम, सशक्त सुशिक्षित सन्नारी। ममतामयी, धरा-सी धीरज धारी।। दया,

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कविता
*चंचल जैन 14/05/202614/05/2026

माँ-सा न कोई दूजा

माँ, ममता की मूरत, माँ, धरा का धीरज, माँ, ममत्व का आँचल, माँ, करुणा सागर।। माँ, प्रभु प्रतिरूप, माँ-सा न

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कविता
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा 14/05/202614/05/2026

मैं पानी हूं

मैं पानी हूंजीवन की कहानी हूंबादल का भाग्यसमुद्र की गहराई हूंगंगा की पवित्रताआंखों की तराई हूं । मैं पानी हूंबूंद

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सम्पादक : डाॅ विजय कुमार सिंघल

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