Category : पद्य साहित्य

  • धूप को चाँदनी नहीं लिखते

    धूप को चाँदनी नहीं लिखते

    धूप को चाँदनी नहीं लिखते आँसुओं को खुशी नहीं लिखते जो कलमकार हैं किसी हालत रात को दिन कभी नही लिखते इश्क जो रूह तक नही पहुँचे हम उसे आशिकी नहीं लिखते उनको कैसे अदब नवाज...


  • चिंता छोड़ करो चिंतन…

    चिंता छोड़ करो चिंतन…

    कुछ भी नही असम्भव जग में, जब करने की ठाने मन। चिंता छोड़ करो चिंतन बस, चिंता छोड़ करो चिंतन।। जीवन के पथरीले पथ पर, कष्ट सहन कर चलते रहना। काली अँधियारी रातों में, दीपक बन...

  • उद्घोष करना है जरूरी…

    उद्घोष करना है जरूरी…

    हाकिमों का दंभ बढ़कर आसमां छूने लगे जब। देश में जन क्राँति का उदघोष करना है जरूरी।। भूल कर जब धर्म सत्ता, हो विमुख कर्त्तव्य पथ से न्याय कुचला जा रहा हो, हर घड़ी जब राज...

  • अपनी हद को पार न करना…

    अपनी हद को पार न करना…

    अपनी हद को पार न करना जीवन को दुष्वार न करना कुर्सी पर जब भी बैठो तो बेबस को लाचार न करना मिलने जुलने में इस दिल को चाहत का बीमार न करना सुख जीवन में...

  • प्रकृति

    प्रकृति

    जब हम अच्छा और बुरा सोचने लगते हैं और वार करने लगते हैं नैसर्गिकता पर। लेकिन प्रकृति ऐसा नहीं करती.. वह जानती है.. क्योंकि कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं होता है। बस होता है तो...

  • जय किसान

    जय किसान

    क्षितिज पर जब हो रही होती पैदाइश नए आदित्य की .. तड़के ही, कॉधे पर रख हल खेत की ओर चल पड़ता…. मन मेअसीम संभावनाओ को भर  ..हल चलाता  महनत  से … पसीना बहाता ,संग होता...

  • हिन्दी को प्रणाम

    हिन्दी को प्रणाम

    हिन्दी तो बस हिन्दी है । मां के सिर की बिन्दी है ।। उर्दु, अरबी या फिर चीनी, अंग्रेजी हो या जापानी, सारे जग में सबसे सुन्दर, सबसे मीठी हिन्दी है । हिन्दी मातृभाषा है ,...

  • मातृभाषा हिन्दी

    मातृभाषा हिन्दी

    खिलखिलाती हंसती जाती, गीत गति के गढ़ती जाती । अनेक विधाएं अदब की इसमें, और हमेशा बढ़ती जाती ।। देषी-विदेशी शब्दों को भी, उर्दु जैसे अरबों को भी, बाहर से आये हर आखर को, अपने अन्दर...

  • आह्वान-गीत

    आह्वान-गीत

    आओ निरंतर पथ चले और, मंजिल का हम वरण करें। पथ की बाधाओं, कांटो का, पौरुष के बल दमन करें।।1।। मानव जीवन की क्षमता, योग्यता का लाभ उठाएं। बैठे रहने से क्या होना, मंजिल के पथ...