धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

रावण प्रकाण्ड पंडित ही नहीं, वैज्ञानिक भी था

रावण को जन सामान्य में राक्षस माना जाता है। जबकि कुल,जाति और वंश से रावण राक्षस नहीं था। रावण केवल सुरों (देवताओं) के विरुद्ध और असुरों के पक्ष में था । रावण ने आर्यों की भोग-विलास वाली ‘यक्ष’ संस्कृति से अलग सभी की रक्षा करने के लिए ‘रक्ष’ संस्कृति की स्थापना की थी। इस संस्कृति […]

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विजयदशमी

विजयदशमी जिसे हम विजय दिवस के रूप में मनाते हैं इस दिन श्री रामचंद्र जी ने रावण पर विजय प्राप्त की थी उसी तथ्य को याद कर हम हर वर्ष विजयदशमी का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाते हैं पर वास्तव में विजयदशमी का त्यौहार हर साल मनाना कहां तक सार्थक है क्योंकि श्री रामचंद्र जी […]

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हमें नित्यप्रति अपनी मृत्यु और परजन्म पर विचार करना चाहिये

ओ३म् हम मनुष्य होने से चिन्तन, मनन व विचार करने के साथ सद्ग्रन्थों का पता लगाकर उनका अध्ययन व स्वाध्याय कर सकते हैं। किसी न किसी रूप में मनुष्य यह कार्य करते भी हैं। इस कार्य को करते हुए हमें इस संसार के रचयिता परमात्मा के सत्यस्वरूप व उसके गुण, कर्म, स्वभावों सहित अपनी आत्मा […]

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ईश्वर को यदि न जाना व पाया तो मनुष्य जीवन अधुरा व व्यर्थ है

ओ३म् हम मनुष्य हैं। मनुष्य मननशील प्राणी को कहते हैं। सृष्टि में असंख्य प्राणी योनियां हैं जिसमें एकमात्र मनुष्य ही मननशील प्राणी है। अतः हम सबको मननशील होना चाहिये। विचार करने पर लगता है कि सभी लोग मननशील नहीं होते। अधिकांश लोगों को अपने बारे में व इस सृष्टि के बारे में अनेक तथ्यों व […]

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तंत्र साधना का आदर्श स्थान- पाण्डव कालीन बगलामुखी मंदिर

मध्य प्रदेश के आगर जिले की नलखेड़ा तहसील जिसकी पहचान पांडव कालिन पीताम्बरा सिद्ध पीठ मॉ बगलामुखी का मंदिर के कारण है। विश्व प्रसिद्ध पीताम्बरा सिद्ध पीठ मॉ बगलामुखी का यह मंदिर शक्ति एवं शक्तिमान के सम्मिलीत प्रभाव से युक्त है। यहॉ पर की जाने वाली साधना आराधना अनंत गुना फलप्रदा होती है। जब कभी […]

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कल्याण मार्ग के पथिक व वीर विप्र योद्धा ऋषिभक्त स्वामी श्रद्धानन्द

ओ३म् स्वामी श्रद्धानन्द ऋषि दयानन्द के शिष्यों में एक प्रमुख शिष्य हैं जिनका जीवन एवं कार्य सभी आर्यजनों व देशवासियों के लिये अभिनन्दनीय एवं अनुकरणीय हैं। स्वामी श्रद्धानन्द जी का निजी जीवन ऋषि दयानन्द एवं आर्यसमाज के सम्पर्क में आने से पूर्व अनेक प्रकार के दुर्व्यसनों से ग्रस्त था। इन दुव्यर्सनों के त्याग में ऋषि […]

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निद्रा से स्वप्न तक की यात्रा

निद्रा और स्वप्न का ज्ञान बड़ा रोचक है।  हम रोज़ाना सोते हैं, पर हम कभी अपनी निद्रा को नहीं समझ पाते, उसे जान नहीं पाते, यह बड़ी विडंबना की बात है। यह ऐसे ही है जैसे किसी व्यक्ति के पास लाखों करोड़ों रुपये हों पर उसे उन्हें खर्च न करना आता हो और जो बड़ी […]

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वेदोद्धारक, समाज सुधारक तथा आजादी के मंत्रदाता ऋषि दयानन्द

ओ३म् विश्व का धार्मिक जगत ऋषि दयानन्द का ऋणी है। उन्होंने विश्व को सद्धर्म का विचार दिया था। एस सद्धर्म की पूरी योजना व प्रारूप भी उन्होंने अपने ग्रन्थों व विचारों में प्रस्तुत किया है। उन्होंने बतया था कि मत-मतान्तर व सत्य धर्म में अन्तर होता है। मत-मतान्तर धर्म नहीं अपितु अविद्या व सत्यासत्य से […]

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मनुष्य को ईश्वर और आत्मा के सत्यस्वरूप को जानना चाहिये

ओ३म् मनुष्य एक ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम प्राणी को कहते हैं। मनुष्य नाम मनुष्य के मननशील व सत्यासत्य का विवेक करने के कारण पड़ा है। वेदों में मनुष्य के लिए कहा गया है ‘मनुर्भव’ अर्थात् ‘हे मनुष्य! तू मनुष्य बन।’ इसका अर्थ है कि परमात्मा ने सभी मनुष्यों को प्रेरणा की है कि तुम […]

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वेदों में वर्णित सभी मनुष्यों के लिए नित्य करणीय पांच कर्तव्य

ओ३म् मनुष्य संसार में आता है। उसकी माता उसकी प्रथम शिक्षक होती है। वह माता जो अच्छा व उचित समझती है वह ज्ञान अपनी सन्तानों को देती है। प्राचीन काल में हमारी सभी मातायें व समाज की स्त्रियां वैदिक शिक्षाओं में निपुण होती थी। उन्हें सत्य व असत्य ज्ञान का विवेक हुआ करता था। वह […]